हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०२

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩


🕉️ श्री परमात्मने नमः 
श्रीमद् भगवद् गीता: अध्याय १

धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥१॥
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(युद्ध में पांडवों को पराजित देखने के लिए धृतराष्ट्र उत्सुक थे )
उन्होंने संजय से पूछा, "मेरे (पुत्र) और पांडु के पुत्र कुरुक्षेत्र पर धर्मयुद्ध के लिए एकत्र हुए हैं। मुझे बताओ, हे संजय, इस समय वहाँ क्या हो रहा है।"

धृतराष्ट्र की भावना देखिए, मेरे और पाण्डु के (पुत्र) !
अर्थात धृतराष्ट्र यह नहीं सोचते कि पांडव भी उनके हैं!

पाण्डव उनके छोटे भाई के पुत्र हैं और धृतराष्ट्र को अपने पिता के समान मानते हैं, उन्हें पिता के समान सम्मान देते हैं, और उनकी आज्ञा का पालन पितृआज्ञा समान ही निष्ठापूर्वक करते हैं। 

पांडवों ने हर बार देखा है कि ताऊजी का व्यवहार उनके प्रति अन्यायपूर्ण हैं, पक्षपाती हैं। 

अनेक प्रसंगों में भीम को क्रोध आता है, वह बोलकर भी दिखाते हैं। लेकिन कुन्ती की प्रेरणा और मार्गदर्शन तथा युधिष्ठिर की सज्जनता के कारण पांडव धृतराष्ट्र का विरोध नहीं करते।
हर बार वे कष्ट सहते हैं, बलिदान देते हैं, अपमान सहते हैं।
वे धृतराष्ट्र की आज्ञा का पालन करते रहते हैं ताकि कुरुकुल का विभाजन न हो और हस्तिनापुर एक शक्तिशाली राज्य बना रहे।

धृतराष्ट्र पाण्डवों के इस गुण से ना प्रभावित हुए है ना ही वह उसको महत्व देते है । 
धृतराष्ट्र सत्ता का लोभ नहीं छोड़ सकतें है !
सुख-सुविधाएँ भोगने की उनकी इच्छा नहीं मिटती !
और अभी भी अपने पुत्रों के प्रति उनके प्रेम की कोई सीमा ही नहीं है !

वह चाहते है कि दुर्योधन विजयी हो और उसे ही राज्य प्राप्त हो।
इसलिए जैसे छोटा बालक बच्चा खिलौने के  लिए पूछता रहता है 'लाए क्या लाए क्या ?' वैसे ही धृतराष्ट्र संजय से पूछ रहे है 'वहाँ क्या हो रहा है ? क्या हो रहा है ?'

क्रमश :

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