हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१३

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।१७।।
द्रुपदो द्रौपदयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक्।।१८।।

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गीताई : (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
मग काश्य धनुर्धारी शिखण्डी ही महारथी।
विराट आणि सेनानी तसा अजित सात्यकी ॥१७॥
राजा द्रुपद सौभद्र द्रौपदीचे ही पुत्र ते।
सर्वांनी फुंकिले शंख आपुले वेगवेगळे ॥१८॥
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इन दो श्लोकों में पाण्डव सेना के विभिन्न योध्दा - रथी - महारथी इनके द्वारा शंखघोष किए जाने का वर्णन है जिनमें मत्स्य देश के राजा विराट , पांचाल नरेश द्रुपद, द्रौपदी के पाँचो पुत्र, अभिमन्यू आदि का वर्णन है।

यहाँ सभी योद्धाओं के विषय में हम विचार नहीं कर रहें हैं। गीता समझने के लिए प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष रूप से जिनपर विचार करना उपयुक्त होगा उन्ही पर हम यथासमय थोडा थोडा विचार करेंगे। 

इन योद्धाओमें सात्यकी है जो यादवकुल से है। वह धनुर्धर है और अर्जुन के शिष्य है।
शिखण्डी भी है, राजा द्रुपद के पुत्र और द्रौपदी के भ्राता ! यह जन्मतः स्त्री थे और युवावस्था में उन्होंने लिंगपरिवर्तन कर पुरुष का शरीर प्राप्त किया। इनके विषय में मान्यता है कि यह अंबा का पुनर्जन्म है। 

अपने कनिष्ठ भ्राता विचित्रवीर्य के लिए भीष्म पितामह द्वारा काशी की राजकन्याओं का अपहरण किया गया था। विचित्रवीर्य व्यसनी और कामासक्त थे। राजा बनने के लिए युद्धनीति, राजनीति, धर्मकारण, समाजकारण, अर्थशास्त्र आदि अनेक विषयों की शिक्षा लेना आवश्यक होता है किंतु ऐसे कष्ट करने की उनकी मनोवृत्ति और संस्कार दोनो ही नहीं थे।
भीष्म ने हस्तिनापुर के सिंहासन के प्रति अपना धर्म समझा की विचित्रवीर्य का विवाह कर राजवंश की वृद्धी होनी चाहिए।

अतः वह काशी गए और वहाँ के स्वयंवर मंडप से तीनो राजकन्याओं का (अंबा, अंबिका, अंबालिका) हरण विचित्रवीर्य के लिए कर लाए।
अंबा नहीं मानी ! 
उन्होने स्पष्ट किया की राजा शाल्व और वह एकदूसरे पर अनुरक्त है। इसलिए उन्होने स्वयंवर में शाल्व का वरण करने का निर्णय लिया था जो भीष्म के कारण नहीं हो पाया। 
यह सुनकर भीष्म ने सम्मानपूर्वक उन्हे शाल्व के पास पहुचाया। परंतु शाल्व ने यह कहते हुए उन्हे नकार दिया की स्वयंवर में भीष्म द्वारा विजय की गई अंबा के साथ विवाह करना उनके लिए भिक्षा लेने समान है।
बेचारी अंबा !
वह हस्तिनापुर वापस आ गई। उन्होने दुर्बल विचित्रवीर्य से विवाह करना मान्य नहीं किया। उन्होने भीष्म से कहा कि उनकी अवहेलना भीष्म के कारण हो रही है, अतः भीष्म को ही अब उनसे विवाह करना होगा।
परंतु अपनी प्रतिज्ञा में बद्ध होने के कारण भीष्म ने उनकी बात नहीं मानी।

कुद्ध (क्रोधित)अंबा ने तपस्या के लिए अकेले ही वन में जाने का निश्चय किया। परंतु जाते जाते वह भीष्म से कह गई की अगला जन्म लेकर वह भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी।
मान्यता है कि शिखण्डी अंबा का पुनर्जन्म है।
पुरुष के रुप में लिंगपरिवर्तन के पश्चात शिखण्डी ने भी युद्धकला का शिक्षण लिया था और समग्र पांचाल कुल के साथ वह भी पाण्डवपक्ष की ओर से युद्धभूमि में आएं थे।

कुरुक्षेत्र पर विभिन्न प्रसंग में अर्जुन के मन की विकल अवस्था और उनके मन की व्याकुलता के कारण भटकते हुए उनके मन को स्थिरचित्त कर उन्हे जो गीतोपदेश दिया गया है उसकी पार्श्वभूमि में यह कथा भी है।
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क्रमश :
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