#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ५ - दि. २९ .०५.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ५ : दि. २९.०५. २०२३
🚩जय श्रीराम🚩
श्री गणेशजी (सत्)बुद्धी प्रदान करने वाले देवता हैं।
वह चौसठ कलाओं के स्वामी हैं।
संगीत (= गायन + वादन + नृत्य ), मूर्तिकला, चित्रकला, पुष्पसज्जा और फुलों के हार बनाने की कला, कपडे और गहने बनाने की कला, पाककला, ग्रंथो को पढने का चातुर्य आदि अन्य भी कलाएँ हैं जिनमे प्रवीण (expert) हैं श्री गणेशजी !
इन कलाओं की आराधना करनेवालों को वह उनका ज्ञान प्रदान करते है ।
साधारणतः कलाप्रेमी कोमल मन के होते है ।
यह नियम तो नहीं हैं परंतु कला में रुचि रखनेवाले सामान्य रुप से सृजनात्मक (productive and meaningful) कार्य करने की वृत्ती के होते हैं और आक्रमकता और हिंसा को त्याज्य मानते है ।
गणेशजी भी कोमल है !
मुख पर विराजमान हास्य और भक्तों को आश्वस्त करनेवाले मृदु भावों से इनका रुप संपन्न हैं !
परंतु 👇🏼
....परंतु, इस कोमलता का और मधुर भाव का अर्थ ना तो दुर्बलता है और ना ही विजय पाने की क्षमता का अभाव !
श्री गणेशजी का रुप देखिए !
बुद्धी और कला के यह देवता सदैव शस्त्रसज्ज है !
हम तो प्रायः गणेशजी के प्रिय मोदक /लड्डू और लाल रंग के फूल की ही चर्चा करते हैं , परंतु गणेशजी सदैव शस्त्र धारण किए हुए ही होते है।
इनके प्रिय शस्त्र हैं परशु (Axe) पाश (Noose) और अंकुश (Elephant goad) .
अर्थात श्री गणेशजी का रुप हमें स्मरण कराता है कि वैयक्तिक जीवन में हमें शांतिप्रिय और मृदु ही होना चाहिए । परंतु शत्रु या दुष्ट बुद्धी के लोग इसे हमारी भीरुता (cowardliness) ना समझे इसलिए हमे व्यावहारिक जीवन में अपनी शक्ती का प्रदर्शन भी करना चाहिए 💪🏽
शठं प्रति शाठ्यम् 👇🏼 !
संस्कृत के अपने मर्यादित ज्ञान के लिए क्षमा चाहूंगी 🙏🏼
परंतु 'शठं प्रिय शाठ्यम्' यह संस्कृत सुभाषित गणेशजी के रुप का तर्कसंगत स्पष्टीकरण (rationale) देता हैं ....
इसका अर्थ हैं कि कपटी व्यक्ति से कपटपूर्ण व्यवहार करो और सम्माननीय व्यक्ति को सम्मान दो इसमें कुछ भी अनुचित (wrong) नहीं हैं ।
महर्षी कपिल मुनि के संरक्षण में रखा हुआ मूल्यवान 'चिंतामणि' राजकुमार गण ने चुराया तब उसे युद्ध में पराजित कर श्री गणेशजी ने यह चिंतामणि मुनिवर को लौटाया था ।
अर्थ 👆🏼 यहीं है की वे सिद्ध कर रहे हैं कि मूलतः मैं शांतिप्रिय, कोमल और भक्तवत्सल हूँ लेकिन दुष्टता और उद्दंडता नहीं सही जाएगी ! उसका दंड दिया जाएगा !
अर्थात हमारे देवता भीरु या दुर्बल (coward) नहीं हैं ...
शत्रु के ललकारने पर वे शस्त्रों का उपयोग कर जीतना जानते हैं 💪🏽
वे दुष्टबुद्धी के लोगों को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रत्येक समय प्रार्थना करने में समय नहीं गँवाते, वे युद्ध के लिए ललकारते हैं 💪🏽
उनके शस्त्र उनकी सज्जा का भाग नहीं हैं (NOT CEREMONIAL), वे शस्त्रों का तत्काल प्रयोग कर दुष्टों का निर्दालन (destruction/defeat) करते हैं 💪🏼
👆🏼यह था गणेशजी की अखंड युद्धसज्जता और विजय का वर्णन !
आगे हम उनके शारिरिक रुप (अर्थात बाह्य रुप ) में निहित अर्थ और प्रतिकों की बात करेंगे ।
गर्व से कहें 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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