#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १७ - दि. १०.०६.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार 
भाग १७ : दि . १०.०६.२०२३

🚩जय श्रीराम🚩

पूर्व में हमने महादेव की दिव्य शक्तियाँ और उनके दिव्य शस्त्र तथा अस्त्रों संबधी चर्चा का प्रारंभ किया था। इस संबध में विषय को आगे बढाने से पूर्व हम शस्त्र - अस्त्र और दिव्यास्त्र व देवास्त्र इनके महत्व पर चर्चा करेंगे। 

आज के आख्यान के अत्यंत महत्वपूर्ण भाग के लिए मैं हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री. नरेंद्र कोहली जी के शरण में आई हूँ । और यह भाग कोहलीजी की महाभारत पर आधारित आठ उपन्यासों की श्रृंखला 'महासमर' (भाग ५)| से उद्धृत कर रहीं हूँ।

यह प्रसंग उस काल के हैं जब दुर्योधन से द्यूत में पराजय के पश्चात बारह वर्षो का वनवास और तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास के लिए पाण्डवों का निवास वन में था।
महर्षी वेदव्यास नें यहाँ पधारकर धर्मराज को स्मरण कराया था कि तपस्या केवल धर्म - संचय के लिए नहीं की जाती हैं , तपस्या से शक्ति भी अर्जित की जाती है और शस्त्र भी प्राप्त किए जाते हैं!
ऋषि के उपदेश के अनुसार दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति के लिए अर्जुन देवलोक की ओर चल पडे । उन्हे स्मरण हुआ की खाण्डववनदहन के पश्चात उन्होने इन्द्र से इन्द्रास्त्र देने का अनुरोध किया था । तब इन्द्र ने कहा था कि प्रथम वह महादेव को प्रसन्न कर उनका पाशुपतास्त्र प्राप्त करें ।
अर्जुन जब इन्द्रकील पर्वत पर पँहुचे तब तपस्वी का छद्म वेष धारण किए हुए इन्द्र से सामना हुआ। इन्द्र की परिक्षा में उतरने के पश्चात अर्जुन ने उन्हे अपनी दिव्यास्त्रो एवं देवास्त्रों की आवश्यकता के विषय में बताया। यह आवश्यकता क्यों हैं यह बताते हुए अर्जुन कहते है 👇🏼

"हम पृथ्वी पर से अधर्म को नष्ट कर देना चाहते हैं; किन्तु अधर्म भयंकर रुप से संगठित और अत्यंत शक्तिशाली है। अतः हमें इतना बल एकत्र करना है  कि हम उन सब के संगठित सैन्य बल को अपनी शक्ति से पराजित कर सकें।"

इन्द्र ने अत्यंत गम्भीर मुद्रा में अर्जुन से कहा, "हम चाहते है कि शस्त्रों क प्रयोग केवल अधर्म के नाश के लिए ही हो। किसी के द्वारा उसका दुरुपयोग ना हो।"
और अब इन्द्र अत्यंत महत्वपूर्ण उपदेश अर्जुन को देते है। उन्होने अर्जुन से कहा कि इसलिए उन्हे प्रथम महादेव शिव के दर्शन करने होंगे, तपस्या से उन्हे प्रसन्न करना होगा।
इन्द्र ने अर्जुन से कहा, "तपस्या से अशिव का नाश होता है और शिव के दर्शन होते है। शिव के दर्शन होंगे तो वे तुम्हे पाशुपतास्त्र देंगे। पाशुपतास्त्र से सज्जित होनेपर तुम्हे अमरावती (देवलोक ) में दिव्यास्त्र और देवास्त्रों की प्राप्ति होगी।"

👆🏼 वस्तुतः दिव्यास्त्र और देवास्त्रों की आवश्यकता के जो कारण अर्जुन द्वारा बताए गए हैं वह प्रत्येक युग में सत्य है । इसिलिए असाधारण  अस्त्रनिर्माता, शक्तिशाली शस्त्रों के संचलनकर्ता और विश्व के संरक्षणकर्ता महादेव शिव की छत्रछाया प्रत्येक युग में वांछनीय है, क्योंकि दुष्ट, दुर्जन और असुरों के सम्मुख शांतिपाठ नहीं किए जाते, उनपर शस्त्र व अस्त्र चलाए जाते है!

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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