#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ३ - दि २७.०५.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ३ : दि . २७.०५. २०२३

🚩जय श्रीराम🚩

मेरी एक प्रिय कहानी हैं।
एक किसान के चार बेटे थे। आपस में लडकर एक दूसरे से दूर रहते थे। एक दिन किसान ने प्रत्येक बेटे को लकडी की एक काठी देकर तोडने को कहा। चारो ने झटके से अपनी काठियाँ तोड डाली। अब किसान ने चार काठीयों को एकसाथ बांधा और चारो बच्चों को एकसाथ मिलकर तोडने को कहा। वे नहीं तोड पाए। किसान ने बच्चों को समझाया की आपस मे लड़कर दूर रहोगे तो विनाश अटल हैं लेकिन मनमुटाव के बाद भी साथ मिलकर रहोगे तो कोई तुम्हारा नाश नहीं कर पाएगा ।

🙆🏻‍♀️कहाँ  मैं भी आपको कहानी सुनाने बैठ गई 🙈
लंबी लंबी गप हाकनेवालो के साथ यही समस्या है, अवसर मिलते ही शुरु हो जाते हैं 😛
चलिए , आज के विषय की ओर चलते हैं 👇🏼

क्योकि धर्म का ज्ञान 👇🏼
हमारा *अधिकार* हैं
हमारा *धर्म* हैं
हमारा *कर्तव्य* हैं

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
आज गणेशजी की जन्मकहानी से संबधित बातों  पर विचार करेंगे ।
माता पार्वती स्वयं देवी थी । फिर भी सुरक्षा की ओर से असावधान नहीं थी । द्वार की रक्षा का प्रबंध करने के पश्चात ही वह स्नान करने के लिए गई ।
श्रीगणेश नामक इस बालक की निमिर्ती यदि हल्दी के मिश्रण से हुई हो तो बहुतों को ठीक लगता हैं । 
लेकिन एक मान्यता तो यह भी हैं कि माता ने अपने शरीर से रगडकर मैल निकाला और बालक की मुर्ती बनाई !
छी! 
शरीर पर इतना मैल !
इतनी गंदगी !
कई सारे लोग इससे लज्जित होते हैं और इस कहानी को नकारना चाहते है ।
वास्तव में लज्जा की कोई बात नहीं हैं ।
इस कहानी का अर्थ इसके शब्दों से परे हैं , विशाल है । यह कहानी एक रुपक है अर्थात Metaphor!👇🏼

संत सज्जनों को छोड़कर प्रत्येक व्यक्ति के मन में मैल हैं । 
बचपन में मन सरल, निश्छल होता हैं । बढती उम्र के साथ मन की इच्छाएँ विकराल रुप लेने लगती हैं। इच्छाएँ पूर्ण करते - करते हमारे मन में ईर्ष्या, दुष्टता , अहंकार बढने लगता हैं और इन भावनाओं की कारण कुविचारों की मैली परत मूल रुप से शुद्ध मन पर चढ़ जाती हैं ।
पार्वती माता ने इस मैल को रगड रगड कर अर्थात प्रयत्नपूर्वक निकालने को सूचित किया हैं । 
और चमत्कार देखिए, इसी मैल से माता ने एक बालक की मूर्ती गढ़ ली !
अर्थात, मलीन मन को शुद्ध करते ही सृजन की, यानि नया कुछ निर्माण करने की क्षमता प्राप्त हो सकती हैं इसका उदाहरण प्रस्तुत किया !
👆🏼 कहीं हम Best from waste का पुराणकालीन रुप तो नहीं देख रहे हैं 😇
द्वाररक्षा के प्रबंध की इस व्यवस्था के कारण एक विशेष मुद्दा ध्यान में आता है। मैं स्वयं स्त्री हूँ इसलिए यह मेरे लिए और भी महत्वपूर्ण हैं।👇🏼
यद्यपि देवता लिंगभेद से परे होते हैं, लेकिन विशेषतः स्त्री को अपनी शीलरक्षा के लिए सदैव सावधान रहना चाहिए यह इस कहानी की प्रथम सीख हैं । द्वाररक्षा की व्यवस्था करने के पश्चात ही वे स्नान के लिए गईं थी।
इसे कोई भी पुरुषप्रधान समाज व्यवस्था से उत्पन्न विचारधारा की संकुचित दृष्टी से ना देखें 🙏🏼👇🏼
मैं स्वयं स्त्रीमुक्ती में विश्वास रखनेवाली महिला हूँ। इसलिए  अत्याचारित स्त्री को समाज जिस उपेक्षा और अपमान का अनुभव कराता है उसे सर्वथा निंदनीय मानती हूँ । 
किंतु यहाँ मैं समाज की बात नहीं कर रही हूँ ! उस भयानक अनुभव को झेलनेवाली स्त्री के तन और मन की पीडा समझ रहीं हूँ । ऐसी यातना से बचने के लिए 'अखंड सावधानता' अत्यावश्यक है यह मैने माता की 👆🏼इस कथा से भी सीखा हैं।

अखंड सावधानता का अध्याय हम कल जारी रखेंगे और राष्ट्ररक्षा के लिए श्रीगणेशजी इस कथा से क्या सीख मिलती हैं इस पर विचार करेंगे !

गर्व से कहें 👇

हिंदू धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳


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