#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १३ - दि. ०६.०६.२०२३
हिंदुधर्मसंस्कार
भाग १३ : दि. ०६.०६. २०२३
🚩जय श्रीराम 🚩
श्री शिवजी के रुप के संदर्भ में हिंदु धर्म की मान्यताएँ, गीतोपदेश आदि की जो चर्चा अबतक की गई है उससे शिवजी की देह के प्रति उदासीनता की भावना स्पष्ट हैं ।
शिवजी के वस्त्र , उनका अलंकारविहीन रुप यह दर्शाता है कि वह देहभावना से उपर है ।
वैसे, अन्य देवता मनभावन रूपसज्जा किए हुए क्यों है इसपर भी हम इस श्रृंखला में अवश्य विचार करेंगे ।
ईश्वर तो स्वयं निराकार है ही, उनका कोई देह नहीं ही है, परंतु शिवजी का यह रुप जिन भक्तों के मन में विरक्ती की भावना प्रबल है उन्हे अवश्य आकर्षित करता होगा ।
शिवजी के संपूर्ण शरीरपर चिताभस्म का लेपन है। उनके माथेपर जो (त्रिपुंड) तिलक है वह भस्म का होता है अथवा चंदन का। तीसरे किसी भी पदार्थ का इसके लिए उपयोग नहीं किया जाता है ।
इस संबध में यह मान्यताएँ है👇🏼
मृत मानवी शरीर को चिता को सौंपते समय 'रामनाम सत्य है' यह घोष किया जाता है।
शिव के आराध्य देव है भगवान श्री विष्णु के अवतार श्रीराम। भोले बाबा शिव श्रीरामजी की भक्ती में इतने तल्लीन (मगन) है कि रामनाम से पवित्र हुई प्रत्येक वस्तु उनके लिए पवित्र, वांछनिय है, चाहे वह चिता भस्म ही क्यों ना हो !
संपूर्ण शरीर पर इस भस्म का लेप लगाने में भी उन्हे कोई आपत्ति नहीं हैं।
शिवजी का संपूर्ण शरीर पर भस्मलेपन करना इस बात का प्रतीक भी है उन्होने सारे संसार का सार ग्रहण कर लिया है।
कैसे ?
मनुष्य / प्राणी अनेक पदार्थ खाते है परंतु शरीर इनमें से केवल सार ही ग्रहण करता है अर्थात शरीर के लिए आवश्यक तत्व जैसे Protein, Vitamin आदि...बाकी सबका शरीर द्वारा त्याग किया जाता है ।
उसी प्रकार इस नश्वर (नष्ट होनेवाले ) देह का सार अर्थात मुठ्ठी - दो मुठ्ठी भर रक्षा (राख/ Ash) को शिवजी ने ग्रहण किया है अर्थात देह की तात्कालिकता / क्षणभंगुरता / नश्वरता (Perishable होने) का संकेत दिया है ...
जिस मनुष्य देह के कारण हमारी इतनी इच्छाएँ - वासनाएँ है उसी मनुष्य देह की अंतिम सचाई को शिवजी ने चिता भस्म लेपन से हमारे सुमुख रखा है।
(वैसे, अत्याधिक थंड में भस्म ऊनी कपड़ों का काम करता है , भस्म के कारण त्वचा के रोम (छेद .) बंद हो जाते है और ठंड से कष्ट नही होता । इसिलिए साधुओं के अनेक पंथो का कटिवस्त्र (कमर पर वस्त्र ) और भस्म यही पहनावा है | )
शिवजी द्वारा त्रिपुंड के लिए केवल चिता भस्म और चंदन इन्हीं दो पदार्थों का उपयोग किया जाना एक और पहलु की ओर संकेत करता है ।
हलाहल विष का सेवन कर उसका दाह झेलनेवाले शिवजी मात्र माथेपर चंदन का त्रिपुंड लगाते है । चंदन शीतल तो हैं परंतु संपूर्ण देह की जलन के लिए केवल माथेपर चंदन की तीन रेखाएँ लगाना देह के कष्टों के प्रति उनकी उदासीनता दर्शाता है।
साथ ही वह पुन्हा रुपसज्जा के प्रति उदासीनता सष्ट कर रहे है।
वह बता रहे है कि चंदन और चिता भस्म दोनो उनके लिए एकसमान है ! उन्हे चंदन का मोह नही है!
शिवगुणगान आगे भी होगा ..
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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