#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १० - दि. ०३.०६.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १० : दि. ०३ .०६.२०२३

🚩जय श्रीराम🚩

महादेव शिव का एक नाम है 'भालचंद्र', अर्थात जिनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है !
चंद्रमा शीतलता का प्रतिक है । मान्यता है कि समुद्रमंथन से निकले हुए हलाहल (विष) को पीने के कारण शिवजी को दाह (जलन / burning sensation) हुआ था। इसलिए इस दाह को शांत करने के लिए शीतल (ठंडा) गुणोंवाले चंद्रमा को महादेव ने मस्तक पर धारण किया था ।
यह तो है मान्यता परंतु हमें इस में अंतर्भूत गहरा अर्थ भी समझना होगा।

भगवान शिव के अनेक रुप है । उनके सरल स्वभाव के कारण वह भोलेनाथ भी कहलाते है।
परंतु शिवजी का सर्वपरिचित रुप है -
क्रोधित होकर दंड देनेवाला रुप..... 
अपने तीसरे नेत्र के खोलते ही ब्रह्मांड का विनाश करने की शक्ति से परिपूर्ण रुप.....
भयंकर हलाहल विष का सेवन करने की क्षमता रखनेवाला उग्र रुप.....
और क्रोध में तांडवनृत्य कर विश्व को भयभीत करनवाला विकट रुप.....

तुलना से इसका अर्थ समझ पाएंगे । 
श्री गणेशजी का कोमल और मृदु रुप, उनके व्यक्तित्व का सहज और आश्वासक भाव श्रद्धालुओं को उनकी ओर आकर्षित करता है । 
परंतु शिवजी के सर्वशक्तीसंपन्न प्रचंड रुप के कारण श्रद्धालुओं के मन में भक्ती और आदर के साथ थोडा दूरत्व का भी भाव उत्पन्न होता है ।

ऐसे में शिवजी ने मस्तक पर धारण किया हुआ चंद्रमा उनके व्यक्तित्व की शीतलता का स्मरण कराता है । 
वह हमे संदेश देता है कि दुष्ट शक्तियों से विश्व की रक्षा करने के लिए मूलतः शांतिप्रिय और सौम्य व्यक्तित्व को भी अपने तेज का, शक्ती और उग्रता का प्रदर्शन करना आवश्यक हो जाता हैं। 
अगर दुष्टों को सात्विक शक्तियों से भय ना हो तो वह दुनिया को अत्याचार और दमन का आखाड़ा बना देंगे । 
इसे रोकने के लिए (अंतर्यामी जो भोले और सरल स्वभाव के भक्तप्रिय शिव हैं ) वह 'खबरदार' की सूचना दुष्टों को अपने रुप द्वारा देते है, वैसे ही जैसे सीमा पर तैनात हमारी सेना शत्रुराष्ट्रों को देती रहती है ।
परंतु उनका युद्धकुशल और शक्तिशाली रुप दुष्ट और कपटी शक्तियों के लिए है , उनके प्रिय भक्तों के लिए वह चंद्रमा समान शीतल ही है !

शिवजी के रुप मे निहित अर्थों की चर्चा हम करते रहेंगे .....

गर्व से कहें 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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