#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १६ - दि. ०९.०६.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १६ : दि . ०९ .०६.२०२३
🚩जय श्रीराम🚩
शिवजी का एक नाम है त्रिपुरांतक । इस नाम की एक कहानी है । कहानी क्या, यह तो शिवजी की अद्भुत शक्तियों की रोमांचित करनेवाली गाथा है।
तारकासुर का वध शिवपुत्र कार्तिकेय ने किया । इसके पश्चात उसके तीनो बेटों ने (तारकाक्ष , कमलाक्ष और विद्युन्माली) घोर तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न किया।
उन्होने ब्रह्माजी से अमरत्व का वरदान मांगा।
ब्रह्माजी ने कहा, "नही दे सकता। इस विश्व में अमरत्व का वर देना संभव नहीं हैं।"
तीनो ने कहा, "फिर हमें नष्ट ना होनेवाला किला दिजिए।"
ब्रह्माजी ने फिर कहा, ''संभव नहीं है। विश्व में ऐसा कुछ भी नहीं हैं जिसे नष्ट ना होना पडे।"
अब बडी चतुराई से तीनो ने कहा,"हमें ऐसे तीन नगर बनाने का वर दे जिसमे रहकर हम एक हजार वर्षों तक पृथ्वी की प्रदक्षिणा करेंगे और हजार वर्षों के पश्चात तीनो नगर जब एक सीधी रेखा में आएं तब केवल पुष्य नक्षत्र में एक ही बाण चलाने पर उस एक बाण से ही इन नगरों का विध्वंस हो सकता हैं, ऐसा वर हमें दे।"
उनकी इच्छानुसार वर देकर ब्रह्माजी अंतर्धान हुए।
विश्व के श्रेष्ठ वास्तुशिल्पी (Architect & Engineer) मयासुर ने इन तीन नगरों का निर्माण किया। वहीं मयासुर जिसने इंद्रप्रस्थ में पांडवों के लिए मयसभा का निर्माण किया था !
विश्व के सारे असुर इन नगरों में आकर बसने लगे। क्योंकि यह नगर नष्ट होना जैसे असंभव ही था !
कुछ समय तो सुरक्षित रहने के वर का उत्सव चलता रहा। फिर राक्षसों ने पृथ्वीवासियों पर विविध अत्याचार प्रारंभ किए।
तब इन नगरों के नाश के लिए देवताओं ने महादेव की प्रार्थना की।
शिवजी के लिए क्या असंभव था ! वह मान गए ।
भगवान विश्वकर्मा ने शिवजी के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण किया जिसके विविध भागों में विविध देवता अपने शक्तिरूप में स्थापित हुए। अपना धनुष्य लिए शिवजी रथ पर आरुढ हुए। इस धनुष्य की शक्ती बने साक्षात भगवान विष्णु और बाण के पृष्ठभाग में वायु। बाण की नोंक पर अग्निदेव सज्ज थे। धनुष्य की प्रत्यंचा बने थे वासुकी नाग। तीन पुरों को एक ही समय नष्ट जो करना था।
परंतु वह विवक्षित क्षण आया और चला गया। शिवजी ने बाण चलाया ही नहीं। वस्तुतः वे देवताओं के मन में आ गए अहंकार को समझ गए थे। देवता मानने लगे थे की इस दिव्य रथ और सारे देवों की मदद के कारण ही शिवजी इस कार्य में यश पा सकते है। उनके घमंड को ताडकर शिवजी ने बाण नहीं चलाया।
देवता असमंजस में पड गए। परंतु शिवजी नगरों की ओर देखकर स्मितहास्य करने लगे। शिवजी की शक्ति से तीनो नगर जलने लगे। तब देवताओं ने जाना कि इस कार्य के लिए शिवजी को ना दिव्य रथ चाहिए ना दिव्य शस्त्र ! वे स्वयं ही समर्थ है !
परंतु ब्रह्माजी के वर का मान रखने के लिए और विश्व में देवताओं के यशगान की आवश्यकता का ध्यान रखकर अब शिवजी ने अपना बाण चलाया और तीनो नगर अधिक तीव्रता से जलकर नष्ट हुए।
इसलिए शिवजी 'त्रिपुरारी' भी कहलाते है।
प्रश्न यह हैं कि शिवजी ही क्यों ?
अन्य कोई देवता क्यों नही ?
क्योंकि भगवान शिव हैं महापराक्रमी और महाबुद्धीमान!
असुरों के सामने शांतिपाठ तो किया नहीं जा सकता है,उन्हे मारना, नष्ट करना ही आवश्यक होता है । असुरों को मारने के लिए शिवजी विभिन्न अस्र बनाते है।
वह देवताओं के भी तारणहार - अस्त्रनिर्माता वैज्ञानिक हैं !
इसी कथा को हम कल और आगे बढाएंगे ...
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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