#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ११ - दि. ०४.०६.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ११ : दि. ०४.०६.२०२३

🚩जय श्रीराम🚩

शिवजी के आख्यान में आज हम उनके गले में जो सर्प हैं उसका विचार करेंगे ।

यह सर्पमाला शिवजी के व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं और उनके अनेक उपदेशों का प्रतिक है ।
शिवजी का एक नाम है 'पशुपति' । 
संस्कृत भाषा में पति शब्द के विभिन्न अर्थ है जिसमे से एक है 'पालनकर्ता' ।
(पति = स्वामी / मालिक) जैसे- 
गडपति =किलों का स्वामी
हयपति = घोडों का स्वामी
वृषपति = बैलों (पशुधन) का स्वामी )
राष्ट्रपति = राष्ट्र का पालनकर्ता (मातापितासमान )

यहाँ शिवजी है पशुपति अर्थात पशुओं के स्वामी / मालिक। 
सभी पशु शिवजी की उनके प्रति प्रेमभावना के कारण उनके दास बने हुए है ।
इसी कारण, जिस सर्प से साधारण मानव को अत्यंत भयभावना होती है उसी सर्प को शिवजी सहजता से अलंकार समान आनंद के साथ धारण कर सकते है । 
उन्हे सर्प से भय नहीं है ! 
उन्होने असाध्य को साध्य बनाया है।

यह सर्प और भी एक महत्वपूर्ण तथ्य का प्रतिक हैं। 
यह 'जियो और जीने दो' (Live & let live ) इस भाव का भी प्रतिक हैं । 
हमारा यह ग्रह केवल मानवजाति के लिए नहीं है, अन्य प्रजातियों के लिए भी है , अनावश्यक रुप से उनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए यह भी शिवजी द्वारा सहजता से सर्प धारण कर दर्शाया गया है। 
मानवकल्याण और परस्पर सामंजस्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उपदेश भी शिवजी सर्पधारण द्वारा दे रहें है।

साथ ही, यह सर्प मनुष्य के अहंकार का प्रतिक है। अंहकार (ego) स्वयं के और दूसरों के सुख को भी नष्ट करता हैं। अहंकार को नियंत्रण में रखने से ही मनुष्य विधायक (productive) कार्य कर सकता है। जैसे सर्प अन्य सब के मन में भय उत्पन्न करता है । वैसेही अहंकार भी अन्य सबको भयभीत / आहत करता हैं।
परंतु अहंकार पर विजय पाकर उसे अपना दास बनाने का उदाहरण शिवजी ने गले में सर्प धारण कर प्रस्तुत किया है।

वस्तुतः देवताओं के उपदेश एकसमान (Overlapping) है। जैसे गीता में भगवान श्रीकृष्ण देह की क्षणभंगुरता विषद् करते हुए बताते है कि  मोक्षप्राप्ती तक चलनेवाली आत्मा की यात्रा में मनुष्य शरीर धारण करने का काल बहुत ही छोटा हैं इसलिए शरीर के सुख के प्रति अनास्था होनी चाहिए।
यहाँ शिवजी अलंकार धारण कर शरीर को सजाने के विपरित गले में सर्प डाले हुए है । 
यह शरीर को सजाने के आडंबर के प्रति उदासीनता का दर्शक है।

शिवजी का आख्यान इतना अधिक दिव्य - अद्भुत हैं कि कुछ दिनों के लेखों की शब्दमर्यादा इनके सम्मुख तुच्छ है।
हम शिवगुणगायन आगे भी करते रहेंगे ।

गर्व से कहें👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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