#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग २१ - दि. १४.०६.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग २१ : दि. १४.०६. २०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
आज हमारे उपक्रम का २१ वाँ भाग है। अतः बुद्धीदाता श्री गणेशजी के चरणों में यह २१ दुर्वापत्तियाँ भक्तिपूर्वक अर्पण🙏🏼
इससे पूर्व गणेश आख्यान और अब शिवजी के आख्यान में भी हमने अनेक देवताओं के नाम लिए थे ।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, देवी माँ, श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि...
आगे और भी नाम आएंगे जैसे
इंद्र, अग्नि, दत्तात्रय, यमदेव, वरुण, ग्रहदेवता, स्थानदेवता, ग्रामदेवता, कुलदेवता, वास्तुदेवता, जलदेवता आदि।
यहीं नहीं, हम तो मनुष्यजीवन के सर्वाधिक गोपनीय माने जानेवाले भाग के लिए भी देव और देवी की मान्यता रखते है अर्थात कामदेव (मदन) और रती !
हिंदुधर्म वास्तव में इन सारे और अन्य भी कई देवताओं को माना जाता हैं !
क्यों ?
देवता क्या इतने सारे होते हैं? या होने चाहिए ?
३३ कोटी देवता ❓😱
वास्तव में यह अत्यंत गंभीरता से समझनेवाला मुद्दा है।
यहाँ 'कोटी' इस शब्द का अर्थ संख्या नहीं है। यानि इसका अर्थ 33 Crores नहीं होता है‼️
यहाँ 'कोटी' शब्द का अर्थ हैं प्रकार (Type)।
इन प्रकारों को इस प्रकार समझा जा सकता हैं👇🏼
किसी भी राष्ट्र को सुचारू रुप से चलाने के लिए सरकार होती हैं। इसमें राष्ट्रपति अथवा राष्ट्राध्यक्ष (President) एक ही होते है।
इनका स्थान सर्वोच्च हैं। परंतु वे सर्वाधिकार अपने ही पास नहीं रखते है।
वे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में विविध कॅबिनेट मंत्री एवं राज्यमंत्रीयों की नियुक्ती करते हैं।
Management में इसे Delegation of Authority & Segregation of Duties (DOA & SOD) कहा जाता है और किसी भी संस्था को सुव्यवस्थित रुप से चलाकर निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह Management के महत्वपूर्ण तत्त्व है। परंतु अंततः यह सारे मंत्री एक ही सर्वोच्च पद के अधीन हैं, मानो उनके ही अनेक हाथों के रूप में काम करते हैं ।
देवताओं के विभिन्न प्रकारों को 👆🏼 इस परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता हैं।
संस्कृत का एक अत्यंत सुंदर श्लोक हैं -
आकाशात्पपतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ,
सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति॥
अर्थ हैं, आकाश से पृथ्वी पर बरसनेवाला पानी जैसे किसी ना किसी प्रकार अंततः सागर में ही जाकर मिलता हैं, ठीक उसी प्रकार किसी भी देवता को किया हुआ प्रणाम अंततः केशव (=विष्णु) के पास ही पँहुंचता हैं।
👆🏼 इस प्रकार हम देवता के किसी भी रुप की कल्पना करे अथवा विभिन्न नाम से उन्हे पँहचाने, परंतु वास्तव में वह एक ही परमात्मा के भिन्न भिन्न रुप हैं, परमात्मा की विभिन्न शाक्तियों का वह दृश्य रूप है!
प्रत्येक व्यक्ती की रुचि - स्वभाव - दृष्टीकोण भिन्न होता है। प्रत्येक को अपनी मनोवृत्ति के अनुकूल देवता की भक्ति का सुख इस व्यवस्था के कारण मिलने की यह अति सुंदर और चतुर व्यवस्था हैं।
...... शंकाओं का लेकिन अंत नहीं होता।
ऐसी व्यवस्था केवल हिंदु धर्म में ही क्यों हैं ?
अन्य धर्मों के समान हम एकेश्वरवादी (एक ही ईश्वर को पूजनेवाले) क्यों नहीं हैं ❓
बस नहीं हैं‼️
क्योंकि ईश्वर को केवल एक ही रुप में पूजना यही आदर्श है यह किसने - कब और कैसे सिद्ध किया हैं❓
नहीं किया है‼️
इसलिए हम हिंदुओं को इस वास्तविकता को भक्तिभाव से ग्रहण करना चाहिए की हम ईश्वर को भिन्न भिन्न रुपों में देखते हैं❗
परंतु हम अन्य धर्मियों की आस्था और भक्ति पर वार नहीं करते है❗
हमने अन्य धर्मियों को यह कभी भी नही पूछा हैं की ईश्वर को पृथक - पृथक सुंदर रूपों में देखने की - पूजने की (Flexible & convenient ) व्यवस्था उनके धर्म में क्यों नहीं है❗
क्योंकि हम अपने धर्म में आस्था रखते है और अन्य धर्मों का सम्मान करते हैं ❗
अन्य धर्मों की मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाने का पातक हिंदु धर्म में वर्जित हैं‼️
गर्व से कहें👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
- सौ. गौरी मिलिंद देशपांडे
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