#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ६४ - दि. २७.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ६४ : दि. २७.०७.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
श्रीराम और रावण दोनो ही शिवभक्त थे।
युद्ध के पूर्व दोनों ने अपने आराध्य देव की पूजा - अर्चना की थी।
दोनो ने अपने आराध्य देव के लिए स्तोत्र की रचना स्वयं ही की थी।
श्रीराम द्वारा की गई शिवस्तुति 'शिव रुद्राष्टक स्तोत्र' कहलाती है और रावण ने 'शिव तांडव स्तोत्र' के रुप में शिवजी से विजय की प्रार्थना की थी।
जिज्ञासू दोनो ही स्तोत्र पढ सकते हैं। दोनो ही स्तोत्रों में उनके रचयिता का स्वभाव, विचार व चरित्र का प्रतिबिंब देखा जा सकता है।
दोनो ही शिवभक्त थे....
दोनो की श्रद्धा समान थी....
स्तोत्र के शब्द रचयिता के व्यक्तित्व के अनुरूप अवश्य थे, परंतु भावना शिवजी को तारणहार मानकर नतमस्तक होने की ही थी....
दोनो ही युद्ध से पूर्व आराध्य देव का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते थे....
ऐसे में शिवजी विजय का आशीर्वाद किसे देंगे ?
यद्यपि देवता की आराधना संबधी सामान्य नियम का पालन दोनो ने ही किया था, शिवजी के आशीर्वाद का फल किसकी झोली में प्रविष्ट हुआ यह हम जानते है !
व्यक्ति द्वारा किया गया पूजा - भक्ती का आडंबर अथवा पूजाअर्चना के लिए राजसी बाह्य उपचार प्रभु को ना तो आकर्षित करते है, ना ही भ्रमित !
रावण द्वारा तपस्या के नियमों का पालन करने के फलस्वरूप देवों को उसे शस्त्र - अस्त्र अथवा वरदान देने की बाध्यता हो सकती हैं (जैसा हमने दि. ०८.०६.२०२३ के भाग १५ में देखा था) परंतु युद्ध में विजय का आशीर्वाद देना बाध्यता नहीं थी! ऐसे में शिवजी ने युद्ध के कारण और दोनो पक्षों द्वारा युद्ध संबंधी पहल को अवश्य महत्व दिया होगा !
रावण ने परस्त्री का हरण करने का अक्षम्य अपराध किया था। विवाहिता स्त्री का बलात् अपहरण व उसके पति द्वारा दूत के माध्यम से भेजे गए संदेश की अवहेलना करने को शिवजी क्षमा नहीं कर सकते थे।
किंतु श्रीराम तो न्याय की पुनर्स्थापना के लिए युद्धसिद्ध हुए थे। शत्रु द्वारा युद्धपूर्व संधि की उनकी पहल को धृष्टता से ठुकराने के पश्चात रावण से युद्ध कर अपनी पत्नी की रक्षा करना यह उनके लिए एकमात्र पर्याय था।
विवाहिता पत्नी के मान की रक्षा पतिधर्म है और राम उसी का निर्वाह कर रहे थे। इसी कारण विजय श्रीराम को प्राप्त हुआ।
रावण और उसके पुत्रों का असाधरण बल व पराक्रम, विविध शस्त्रों से सज्ज राक्षसों की शक्तिशाली सेना, अपनी ही भूमिपर युद्ध करने के लाभ इ. के सम्मुख खडी थी वानरसेना जिसकी शक्ती राक्षसों की तुलना में कम ही थी। कितने शस्त्र वह किष्किंधा से सागरपार की लंका में साथ ला पाए होंगे इसकी कल्पना की जा सकती है, अर्थात इसमें भी वह राक्षससेना की तुलना में कमतर ही होंगे। लंका उनके लिए अपरिचित भी थी और मायावी राक्षस किस दिशा से धावा बोलेंगे यह समझना भी कठिन था।
कुल मिलाकर लंकाधीश के सैन्यबल के सम्मुख वानरसेना की स्थिति अच्छी नहीं थी, परंतु जीत उन्हीं की हुई और इतिहास में वानरजाति अमर हो गई।
कहना ना होगा की यह सत् का असत् के साथ युद्ध था जिसमें सत्पक्ष का विजय निश्चित था। वानरराज सुग्रीव व उनके अनुयायियों के सम्मुख पर्याय भी था और प्रलोभन भी ! किंतु उन्होने श्रीराम का साथ देने के लिए अपना जीवन दाँवपर लगाया और जनमानस में अमरत्व पा लिया !
इसके पश्चात प्रभु की जयजयकार के सिवा कुछ शेष नहीं रहता ..
गोस्वामी तुलसीदासजी के शब्दों में 👇🏼
"राम भरोसो, राम बल, राम नाम बिस्वास॥
सुमिरत सब मंगल कुसल, मांगत तुलसीदास॥"
(अर्थात तुलसीदासजी मांग रहें है कि मेरा विश्वास एकमात्र राम पर रहें, राम की ही कृपा से हमे बल मिले और जिन राम के मात्र स्मरण से सब कुशल, मंगल होता है उनका हमें स्मरण रहे).
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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