#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ४७- दि. १०.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ४७ : दि. १०.०७.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
अयोध्या नगरी से निकलकर प्रभु ने भ्राता लक्ष्मण व सीताजी के साथ वनवास आरंभ किया।
गोमती नदी पार कर वे प्रयागराज पँहुंचे।
वहाँ से श्रृंगवेरपुर (आधुनिक सिंगरौर, उत्तरप्रदेश) में निषादराज गुह व पत्नी गंधा ने उन्हे नौका से गंगा पार कराई।
अगला पडाव था चित्रकूट पर्वत जहाँ से उन्होने सतना (मध्य प्रदेश) होते हुए छत्तीसगढ के निबिड वनप्रदेश में प्रवेश किया ।
छत्तीसगढ श्रीरामजी का ननिहाल हैं। उस युग में इस प्रदेश को महाकौशल कहा जाता था।
रायपुर के निकट चंदखुरी माता कौशल्या का जन्मस्थान हैं। यहाँ के अर्थात महाकौशल के राजा भानुमंत की अनुपम सुंदरी व गुणवती पुत्री कौशल्या रघुकुल की महारानी बनी थी।
अपने ननिहाल के प्रदेश में अर्थात दंडकारण्य में उनका वास्तव्य साधारणतः दस वर्षों तक था।
दंडकारण्य अर्थात आधुनिक छत्तीसगढ, ओदिशा, तेलंगणा व आंध्र प्रदेश के वनों से बना भाग !
यहाँ से प्रभु संभवतः अमरकंटक गए थे व आगे जनस्थान का भाग पंचवटी (नासिक) गए।
यहीं से रावण द्वारा सीताहरण के पश्चात रामायण का अद्भुत अध्याय प्रारंभ होता हैं।
यहाँ से पंपा सरोवर के निकट शबरी की पूजा स्वीकार कर वे मलय पर्वत पार कर (आधुनिक कर्नाटक राज्य के) हम्पी के निकट ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे। यहाँ उनका सुग्रीव व हुनुमान से परिचय हुआ।
किष्किंधा में वालीवध के पश्चात उन्होने कोडीकरई में समुद्रलंघन हेतु सर्वेक्षण किया। किंतु यहाँ से लंका पहुँचना सुगम नहीं था। प्रभु रामेश्वरम् को ओर बढे व निकट ही धनुष्कोडी से लंका तक रामसेतू का निर्माण हुआ ।
👆🏼 यह थी वनवासकाल की साधारण रुपरेखा। हम इसमें अंतर्गत श्रीराम द्वारा किए गए राष्ट्रहितरक्षण के प्रयासों को समझने का यत्न करेंगे !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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