#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ५९ - दि. २२.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ५९ : दि. २२.०७.२०२३
🚩 🚩जय श्रीराम 🚩🚩
विभीषण
विभीषण का नाम रामभक्तों में आदर से लिया जाता हैं। किंतु प्रसंगवश उन्हे 'घरभेदी' भी कहा जाता है। अर्थात कुल के विरुद्ध जाकर शत्रु की सहायता करने के उनके कथित 'अपराध' के कारण उन्हे संपूर्ण / संदेहरहित मान सम्मान नहीं दिया जाता है यह विभिषण की शोकांतिका हैं!
ऋषि पुलस्ति के पुत्र विश्रवा और राक्षसी कैकसी के पुत्र थे रावण, कुंभकर्ण व विभीषण व उनकी बहन शूर्पणखा।
रावण, कुंभकर्ण व शूर्पणखा का आचार-विचार- व्यवहार राक्षस कुल के अनुरूप था, किंतु विभीषण स्वयं को ब्राह्मण मानते रहे क्योंकि वे ब्राह्मणपुत्र थे और उनका व्यवहार भी इस कुल के अनुरूप था।
विभिषण की पत्नी सरमा संभवतः गंधर्वकुल से थी जिसका व्यवहार पति के विचारों से मेल खाता था। अपहरण कर लंका में बंदिनी बनाई गई सीता के साथ मन को शांति देनेवाला व्यवहार करनेवाले विभीषण - सरमा और उनकी कन्या त्रिजटा ही थे।
इसकी कल्पना करना कठिन ना होगा की भरी राजसभा में अथवा व्यक्तिगत भेंट में भी रावण द्वारा किए गए सीताहरण को निंद्य बताकर उसे पति के पास भेजने का आग्रह करना विभीषण के लिए कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा ! रावण तो फिर रावण ही था। उसके सामने उसके निर्णय व व्यवहार की निंदा करने का साहस केवल अत्यंत साहसी व्यक्ति ही कर सकता हैं।
इस परामर्श का कोई उपयोग ना होता देख अंत में विभीषण श्रीराम की शरण में आए। कहना ना होगा की युद्धनीति निर्धारण के लिए लंकावासी विभीषण की सहायता अवश्य ली गई होगी।
रावणवध व युद्धसमाप्ती के पश्चात विभीषण को लंका में राज्यभिषेक कर श्रीराम अयोध्या लौट गए।
इसके पश्चात विभीषण संबधी बहुत अधिक सूचनाएँ उपलब्ध नहीं हैं। परंतु श्रीरामसेवा में उनके अनन्य स्थान के लिए उन्हे चिरंजीवीत्व प्राप्त हुआ यह मान्यता हैं। हनुमानजी भी चिरंजीव हैं। अर्थात यह माना जा सकता हैं कि प्रभु ने दोनो को समान दृष्टी से देखकर सम्मानित किया है।
अत्यंत विपरीत स्थिति में भी सत्य के मार्ग पर चलकर, अपने आसपास के परिवेश से उपर उठकर स्वयं को भगवद्सेवा व भगवद्भक्ति के लिए समर्पित करने का यह अनुकरणीय उद्दाहरण हैं।
ऐसे ही उज्वल चरित्रधारी स्त्री - पुरुषों की चर्चा हम प्रसंगोत्पात करते रहेंगे।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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