#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ७३ - दि. ०५.०८.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ७३ : दि. ०५.०८.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
श्रीकृष्णजन्म की परिस्थितियाँ रोंगटे खडे करनेवाली हैं और कृष्णजन्म का प्रसंग मन को आश्वस्त करनेवाला हैं।
कदाचित हजारो वर्षों के पश्चात कृष्णचरित्र हमें इसलिए भी मोह लेता हैं की इसमें केवल कृष्ण जन्म की कथा ही नहीं, इसमें मनुष्य को ग्रस्त करनेवाले काम - क्रोध - लोभ - मोह - भय - मद - मत्सर - आसक्ति आदि सभी भावनाओं के उदाहरण हैं !
सनातन हिंदु धर्म के इतिहास में ऐसे कितने ही प्रसंग हैं जो हम कहानियों के रुप में सुनते आए हैं।
शिवजी, गणेशजी , श्रीराम - श्रीकृष्ण, हनुमानजी, भक्त प्रल्हाद और बालक ध्रुव , हरीश्चंद्र तारामती, बालक चिलया, धौम्य मुनि व शिष्य आरुणि, अनसूया माता और दत्तभगवान.... इन सब से संबधित प्रसंग हमने तो बचपन में कहानियों के रुप में ही सुने थे। इनमें हमने महाभारत के प्रसंग, समुद्रमंथन, भस्मासुर और मोहिनीरूप इन सबको तो जोडा ही नहीं हैं !
यह प्रसंग न केवल घटना हैं, ना कहानियाँ !
यह तो संस्कार करने की और संस्कारित होने की दिशा में एक निश्चित पहल हैं। क्योंकि प्रत्येक प्रसंग हमें कुछ तो बोध कराता हैं जैसे -
सत् का असत् पर विजय....
सत्यभाषण / सद्वर्तन की प्रतिज्ञा व दुष्टनिर्दालन के कर्तव्य दुविधा पर उपाय...
गुरुजनों का आदर व आज्ञापालन का महत्व.....
संयमित जीवन का महत्व... आदि.
यही तो धर्मसंस्कार हैं !
धर्मसंस्कार का कोई शिक्षावर्ग अथवा कोई निर्ष्दिष्ट समय नहीं होता हैं।
यद्यपि प्रवचन - कीर्तन - भागवतकथावाचन - रामचरित्र गायन यह सब धर्मसंस्कार ही करते हैं, परंतु यह सब दैनंदिन जीवन में संभव नहीं है।
दैनंदिन जीवन में पूजा करना, श्लोक - स्तोत्रपठन, यह हो सकता हैं।
परंतु यह वयस्क व्यक्तियों के लिए हैं।
बच्चों के लिए क्या हैं ?
उनके लिए कहानियाँ होनी चाहिए जैसे हम बचपन में माँ से, दादा - दादी, नाना - नानी से सुनते थे....
सोशल मिडिया तो अब हमारे जीवन का भाग बन गया हैं, वह अब रहेगा। परंतु यह हमें सोचना चाहिए की हम बच्चों को सोशल मिडिया से भी अधिक आकर्षक मनोरंजन कैसे दे सकते हैं और इसका उत्तर हैं कहानियाँ , बच्चों के साथ खेलना , बच्चों को वैसा उदाहरण देना ( जैसे बच्चा कूदता हैं तो कह सकते हैं कि आप तो एकदम हनुमानजी जैसे शूरवीर हो ! ) .
धर्मसंस्कार के मार्ग और भी हैं 👇🏼
1) हर दिन प्रातः उठनेपर घर में अपने अपने छोटे - बडे पूजाघर के सामने खडे होकर ईश्वर को नमन करें । जो हमे अच्छा लगता हो ऐसा एक श्लोक अवश्य बोलें और मस्तक झुकाकर नमन करें।
२) आंगन में या गमले में तुलसी का पौधा लगाए। उसे प्रति दिन पानी दें।
३) संध्या समय पूजाघर में दिया और अगरबत्ती जलाए। तुलसी के पौधे के सामने भी दिया जलाए। इस समय आपके बच्चों को साथ लें और तुलसीमाता को प्रणाम करवाएं।
४) बच्चे थोडे बडे होंगे तब उन्ही के हाथ में दिया दें और तुलसीमाता के सामने रखने के लिए कहें।
५) शनिवार या रविवार को बाजार तो जाना ही पडता हैं। उस दिन आपस में उत्साह से बात करें की 'पहले हम मंदिर जाएंगे , फिर बाजार में .. ' | जाते समय भोग चढने के लिए बच्चोंको अच्छे लगनेवाले थोडे पेडे - बर्फी ले जाए ।
कुछ सालों बाद उन पेडे बर्फी का नहीं , मंदिर के लिए भक्ती और दर्शन का मोह बच्चों के मन में अवश्य होगा !
६ ) जीवन अब अत्यंत गतिमान है| पूजापाठ के लिए कम समय मिलता है।
कोई बात नही . .
जाप का यंत्र आजकल मिलता है , जैसे 'ॐ नमः शिवाय' , 'श्रीराम जयराम जयजयराम' आदि। ऐसा यंत्र खरीदकर लाए और प्रतिदिन प्रातः और संध्यासमय आधा घंटा उसे सुने। You Tube पर भी है। जाप कर नहीं सकते परंतु सुन तो सकते हैं। तब बच्चे भी तो इसे सुनते हैं !
धर्मसंस्कार घर में बच्चों को भाषण देकर नहीं होते हैं ! बच्चे हमारे आचरण को देखकर सीखते हैं ।
आईये, सनातन हिंदू धर्म के ममतामयी छत्र में हमारी आनेवाली पिढियों को संस्कारीत बनाने का संकल्प करें 🙏🏼
कल से हम कृष्णकथा को आगे बढाएंगे ..
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें