#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ६३ - दि. २६.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ६३ : दि. २६.०७.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
किष्किंधा में सुग्रीव के राज्यभिषेक की व्यवस्था करने के पश्चात श्रीराम सुग्रीव द्वारा सीताशोध में सहायता की प्रतिक्षा करते रहे। किंतु अपने राज्य में उलझकर सुग्रीव द्वारा इसमे अत्याधिक विलंब हुआ।
अंत में श्रीराम ने दूतद्वारा सुग्रीव को उसके दायित्व का बोध कराया गया। सुग्रीव लज्जित हुए और उन्होने कार्य का आरंभ किया। वानरों की विविध टोलियाँ विभिन्न दिशाओं में सीताशोध के लिए भेजी गई।
हनुमान, जांबुवंत इ. की टोली को सीताजी के संबध में निश्चित सूचना मिली होगी जिसके पश्चात हनुमानजी द्वारा लंका पँहुंचकर सीताजी को श्रीराम का दूत होने बताया गया । इसके संबध में हमने हनुमानजी के संदर्भ में की थी। लंका में रावण के साथ युद्ध करना ही होगा यह स्पष्ट हुआ। तब नल व नील द्वारा वानरों की सहायता से सेतु निर्माण किया गया। इस संबध में विस्तारपूर्वक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए हमें इस संबध में तर्क ही करना पडता हैं।
विचारणीय बात हैं कि भारत के दक्षिण भाग से लंका तक वानरों की संपूर्ण सेना पँहुच पाए इतने विशाल सेतु का निर्माण हो रहा था और लंका की ओर से इस में बाधा नहीं डाली गई। कदाचित इसलिए की साधारण मनुष्यों के निवासस्थान अर्थात भारत से कोई आक्रमण ना होने का इतना विश्वास लंका के राज्यकर्ता व शासन को था की उन्होने ऐसी गतिविधियों की सूचना पाने / रोकने के लिए रक्षक / गुप्तचर आदि नियुक्त ही नहीं किए थे ! सत्ता और बल के मद के कारण असावधानी व परिणामतः अटल विनाश का यह प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
राम व उनकी सेना के लंका पहुंचनेपर ही रावण को इस संबध में सूचना मिली।
क्रुद्ध रावण ने अपनी सेना को युद्ध का आदेश दिया होगा। परंतु एक और संभावना भी हैं।
रावण शक्तिशाली और क्रूर अवश्य था, साथ ही उसकी धूर्तता पर संदेह नहीं होना चाहिए।
यह संभव हैं कि उसने सुग्रीव व वानरसेना को श्रीराम से दूर करने का प्रयत्न किया होगा। वैभवशाली लंका द्वारा साधारण वानर राज्य को सहायता व द्रव्य का प्रलोभन दिया गया होगा... अथवा श्रीराम की युद्ध में मृत्यु / पराजय की स्थिति में वानर राज्य को पूर्णतः लंकाधीन करने का डर दिखाया गया होगा...
अथवा राम लक्ष्मण जैसे बाहरी व्यक्तियों के लिए राक्षससेना व वानरसेना का विनाश ना करने संबधी दिशाभूल की गई होगी...
परंतु राक्षसों के प्रलोभन अथवा डर के कारण सुग्रीव पीछे हटे नहीं थे। उन्होने श्रीराम का ही साथ दिया।
इधर विभीषण श्रीराम की शरण में आएं और लंकानगरी, वहाँ का प्रशासन, सैन्यबल, राक्षसों की युद्धनीति, शत्रुपक्ष के बलवान सेनानायक इ. पर महत्वपूर्ण सूचनाएं श्रीरामसेना को अनायास उपलब्ध हो गई।
'ज्योत से ज्योत जगाते चलो' इसका यह👆🏼महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
हमें भी अपने मन में ईश्वरभक्ति , न्याय में आस्था व औरों के प्रति सद्भावना की ज्योति प्रज्वलित रखनी चाहिए 🙏🏼
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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