#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ६५ - दि. २८.०७.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ६५ : दि. २८.०७.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

श्रीराम - रावण के युद्ध की प्रमुख घटनाओं पर हमने रावणपुत्र मेघनाद के संदर्भ में विचार किया था।

मेघनाद के साथ रावण के सात पुत्र थे। इनमें से अक्षकुमार की मृत्यु हनुमानजी के हाथों उनकी लंका भेंट के समय हुई। 
आगे युद्ध में मेघनाद सहित अतिकाय, त्रिशिरा, प्रहस्थ, देवान्तक व नरान्तक इन सभी रावणपुत्रों की मृत्यु हुई।

कहना ना होगा कि प्रत्येक ने अपने पिता के विजय के लिए अत्यंत पराक्रम किया परंतु अंततः विजय श्रीराम की ही हुई।

इस युद्ध के संबध में कुछ अत्यंत विचारणीय मुद्दे हैं 👇🏼

(१) यह युद्ध दो राज्यों के बीच युद्ध नहीं था। एक अत्याचारी, कामांध पुरुष द्वारा एक सत्शील - पराक्रमी योद्धा की पत्नी का हरण करने के कारण यह युद्ध दो व्यक्तियों की वैयक्तिक शत्रुता के कारण हुआ युद्ध था।

(२) यद्यपि इस युद्ध में ना वानरजाति ना किसी अन्य स्थानिक मानवसमाज का कोई मुद्दा था, फिर भी श्रीराम व उनकी सेना को पूर्ण जनसमर्थन, समर्पण व सहयोग प्राप्त हुआ।
राज्यहीन श्रीराम ने लंका तक व लंका में भी वानरसेना का दायित्व कैसे उठाया होगा ?
सेनिकों के लिए भोजन, वस्त्र, शस्त्र व निवासव्यवस्था की आवश्यकता होती हैं, युद्ध मे घाव लगनेपर वैद्य व औषधि आवश्यक रहे होंगे। 
....किंतु राम के पास तो कुछ भी नहीं था। ऐसे में हमें मानना पडता हैं कि राक्षसों से पिडीत स्थानिक जन श्रीराम की सहायता करते रहे होंगे। 
श्रीराम के मोहक रुप, मृदु वाणी व सौम्य व्यक्तित्व ने उन्हे मोह लिया होगा। 
ऐसा जननायक तो उन्होने देखा ही नहीं होगा, वे तो उनकी संपत्ति, धान्य व उनकी स्त्रियां लूटनेवाले राक्षस नायकों को ही जानते थे। 
परंतु अपनी पत्नी को रावण की कैद से मुक्त कराने के लिए उसपर सेनासहित आक्रमण करनेवाले पुरुष में उन्होने अपना तारणहार देखा हो सकता है !

(३) श्रीराम की सेना उनके अपने राज्य अर्थात कोसलदेस से नहीं थी, वह तो किष्किंधा की वानरसेना थी। ऐसे में राम और उनकी सेना में भावात्म संबध कैसे हो पाया ? 
यह मानना होगा की श्रीराम का व्यवहार व उनके व्यक्तित्व से छलकती आश्वासिता ने इस सेना को अभूतपूर्व पराक्रम कर राक्षसों की सेना से युद्ध के लिए प्रेरित किया था।

परंतु यह बात राक्षससेना के लिए सोचना कठिन है। राक्षससेना बल व अत्याचारी हथकंडों के चलते विजय की अभ्यस्त थी। युद्धोपरांत पराजित पक्ष का धन लूटना, उनकी स्त्रियों का अपहरण करना यही उनकी पद्धती थी।
रावण पर उनकी निष्ठा नहीं होगी, अपनी विलासी वृत्ती के कारण रावण द्वारा जमा किए गए सामान के कुछ छींटे पाने की लालायित वह लोभी सेना थी।
पराजित तो वह होते ही नहीं थे इसिलिए, श्रीराम लक्ष्मण के नेतृत्व में शत्रुपक्ष से हार वे सह नहीं पाए होंगे। 
..... वैसे भी पराजय की आशंका /निश्चिती में भी स्वामी के प्रति समर्पण भाव से बद्ध होकर प्राण हथेलीपर लेना राक्षसों की पद्धति नहीं हो सकती थी! 
और अपने नेता से प्रेम-भक्ती ना करनेवाली सेना विजयपथगामिनी नहीं हो सकती हैं❗

(४)  रावण की मृत्यु के पश्चात लंका के राजा के रूप में विभीषण का राज्याभिषेक हुआ। वस्तुतः युद्ध में विजयी श्रीराम हुए थे। ऐसे में सामान्य पद्धति यही थी कि विजयी वीर का राज्याभिषेक होता था अथवा हारनेवाले राजा को जीतनेवाले राजा के अधीन (अंकित के रूप में) कनिष्ठ भूमिका दी जाती थी अर्थात उसे राजपद मिलता था परंतु स्वतंत्रता नहीं। विजयी राजा को भरपूर धन देकर उसकी नीति व निर्णयों के अनुसार राज्य करना यही बाध्यता होती थी। 
परंतु श्रीराम ने ऐसा कुछ नहीं किया। लंका स्वतंत्र राज्य ही बना रहा। 
रावण ने लंकानगरी अपने सौतेले भाई से अर्थात देवों के कोषाध्यक्ष कुबेर से छीन ली थी इसी तथ्य से लंका की सांपत्तिक स्थिति का अनुमान किया जा सकता है। उसके पश्चात रावण के शासनकाल में लंका और समृद्ध बन गई होगी यह निश्चित है। 
इतने धनी राज्य को सहजतापूर्वक पूर्णतः विभीषण को सौंपने की कृती श्रीराम के स्वार्थहीन विशाल हृदय का पुनः परिचय देती हैं।

सुग्रीव और विभीषण दोनो ही रामभक्त बन गए थे परंतु किष्किंधा और लंका, दोनो ही राज्यों से श्रीराम ने ना तो द्रव्य की माँग की थी अथवा मांडलिक राज्य बनने का आग्रह किया था।
इसी से स्पष्ट होता है कि श्रीराम का व्यक्तित्व व्यक्तिगत स्वार्थभावना से सर्वथा दूर और स्थानिक प्रजा के कल्याण के लिए ही समर्पित था।

श्रीरामचरित्र ऐसे अनेक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करता हैं जिसका अनुकरण हमारी आकांक्षा होनी चाहिए🙏🏼।

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१३

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४८

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०२