#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ७६ - दि. ०८.०८.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ७६ : दि. ०८.०८.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
श्रावणमास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्यरात्री के समय श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।
परिस्थितियाँ अत्यंत अनुकुल थी।
कृष्णपक्ष के कारण वैसे भी चंद्रमा का प्रकाश क्षीण ही था, काले मेघों के कारण अंधकार अधिक गहरा हो रहा था, भारी वर्षा के साथ कदाचित विद्युल्लता का तांडव और अति वेगवान हवा भी चल रही होगी....
हम उस युग की बात कर रहें हैं जब विद्युत दीपों से प्रकाश नहीं होता था। घर में तेल के दीपक जलाए जाते थे जिनका प्रकाश ऐसी काली रात में घर के बाहर तक पहुँचने की संभावना नहीं थी।
सारांश, कंस और उसके जैसे असुरों के आतंक से विश्व को मुक्ती दिलाने के लिए जिसका जन्म होना था और इसकी पूर्वसूचना के कारण जिसकी हत्या की पूर्ण योजना कंस ने बनाई थी, उसे झाँसा देकर पृथ्वी पर अवतरित होने के लिए प्रभु ने कितनी चतुराई से योजना बनाई थी !
देखा जाए तो ऐसे नाट्य की आवश्यकता प्रभु को नहीं होती हैं। वामन अवतार और नरसिंह अवतार तो वयस्क व्यक्तियों के रुप में ही हुए थे। कृष्ण अवतार में भी विराटरूप दर्शन का चमत्कार प्रभु ने दिखाया था। ऐसे में नन्हे बालक के रुप में जन्म लेने के लिए इतनी जटिल (complicated) योजना बनाने की क्या आवश्यकता थी?
इसके कारण यह हो सकते हैं👇🏼
ईश्वर अवतार का कोई एक ही प्रकार / पद्धति (pattern) नहीं होता हैं। आवश्यकता के अनुसार ईश्वर योजना कार्यान्वित करते है (implement)।
..और वैसे भी आकस्मिक आघात युद्धतंत्र का महत्वपूर्ण नियम है। इसलिए संकट किस रुप में आएगा इसके लिए अपने शत्रु को (कंस = असुर / दुराचारियों को) कैसे संभ्रमित रखना है इसका प्रात्यक्षिक प्रभु ने दिखाया हैं।
दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि जब कोई महानायक अपनी शूरवीरता - बुद्धीमानी - युद्धचातुर्य से असुरों का / दुष्टों का / अत्याचारियों का नाश करता हैं तब सामान्य प्रजा उसपर निर्भर रहने लगती हैं। जनता यह समझ ही नहीं पाती हैं कि समाज के एकत्रीकरण से, अपना बल बढाकर और योजना बनाकर सामान्य जनों का समूह भी दुष्ट निर्दालन कर सकता है !
अनंत काल तक अत्याचार सहन करते रहना यह विवशता नहीं होनी चाहिए, समाज के वैसे गुणों वाले व्यक्ती को नेता बनाकर योजनाबद्ध रुप से आतंक का सामना किया जा सकता हैं इसका विश्वास सामान्य जन को देना यहीं प्रभु की योजना थी।
हमने पहले भी देखा हैं कि रावण का पारिपत्य करने के लिए स्वयं पूर्णतः सक्षम होनेपर भी श्रीराम ने वानरसेना को अपने साथ लिया था क्योंकि लंका के निकट भारत के दक्षिणभाग में रहनेवाले लोगों के मन में भी ऐसा विश्वास जगाना आवश्यक हो गया था !
कृष्ण को विष्णु अवतार हम आज कहते हैं। परंतु द्वापारयुग के उस काल में - यद्यपि देवकी के आठवे पुत्र द्वारा कंस की मृत्यु की भविष्यवाणी हुई थी - क्या सब जानते थे की यह भगवान विष्णु के अवतार हैं ? लोगो ने प्रारंभ में उन्हे अपने तारणहार नेता के रूप में ही देखा होगा और अपने दुखों को दूर करने का साहस रखनेवाले महानायक के रूप में ही उन्हे सबका समर्थन मिला होगा।
कृष्णआख्यान अत्यंत रसपूर्ण विषय हैं। कहते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीता पढते के प्रत्येक समय उसमें से नए अर्थ समझ आते हैं, उसका जितना भी अभ्यास करेंगे, हर पठन में वह कुछ नए रुप में, नए मुद्दों का बोध कराती है।
ठीक इसी प्रकार कृष्णचरित्र भी अत्यंत अद्भुत है । विचार करने पर नित नए पहलु सामने आते हैं ! इस श्रृंखला में हम अपनी क्षमताभर कृष्ण चरित्र को समझने का प्रयास करेंगे🙏🏼
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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