#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ८३ - दि. १५.०८.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ८३ : दि. १५.०८.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
वसुदेव के लौटने के पश्चात नंद ने रात कैसे काटी होगी इसकी कल्पना करना कठिन है।
घर में नवप्रसूता पत्नी बेसुध अवस्था में थी, वसुदेव का नन्हा पुत्र उसके पास सो रहा था परंतु अपनी नवजात कन्या का वृत्तांत जानने का कोई साधन नंद के पास नहीं था।
कंस के क्रौर्य से परिचित थे नंद, इसलिए अपनी कन्या को उन्होने किस संकट में झोंक दिया था यह बात वह जानते थे।
परंतु यह क्षणिक उर्मी में लिया गया निर्णय नहीं था। कंस का नाश कर न्याय और धर्म की स्थापना करनेवाले महामानव की लीला के लिए नंद ने अपनी कन्या के साथ अपनी वात्सल्यभावना की आहुति अत्यंत कठिन हृदय से दी थी।
साथ ही पत्नी से छिपाकर यह सब करना और यशोदा की जायी कन्या का उसे मुखदर्शन भी कराएं बिना उसे मृत्युमुख में झोंकने के कारण नंद अपराधबोध से भर गए होंगे।
भविष्य में कभी भी यदि यशोदा यह जानेगी तब क्या करेगी वह ?
उसकी उपालंभ भरी दृष्टी का सामना कैसे करेंगे नंद ?
उसके पश्चात उनकी गृहस्थी कैसे होगी ?
होगी भी अथवा यशोदा उनका त्याग करेगी ?
अबतक नंद यशोदा का सहजीवन विश्वास और प्रेम का था, यशोदा के संतान ना होनेपर भी नंद उसे सांत्वना ही देते रहे थे।
और ईश्वर की कृपा से जब यशोदा की गोद हरी हुई है, तब नंद ने क्या किया ?
उसे कंस जैसे दुरात्मा को सौप दिया ?
नंद जब अपनी पत्नी को बताएंगे की उसके पुत्र हुआ है तब उनका स्वर स्थिर रह पाएगा भी ? काँपेगा नही ?
व्याकुल करनेवाले , मन पर आक्रमण कर विचलित करनेवाले इन प्रश्नों को दूर कर नंद स्वयं को ही ढाढस बंधाते रहे।
मानवजाति के इतिहास के एक महानाट्य का प्रारंभ हो चुका था और नायक के जीवन में नंद की प्रमुख भूमिका थी !
नंद को डटकर खडा रहना होगा, मन की अस्वस्थता को छिपाना होगा, केवल एक ही समय जिसे वह स्पर्श कर पाए थे उस कन्या की कोमल स्मृति को वह इस नन्हे शिशु के बाललीलाओं की आड में देखने का प्रयास करेंगे और मन ही मन उस अबोध कन्या के लिए आँसु बहाएंगे !
परंतु जनव्यवहार में भी और यशोदा के सामने भी नंद 'अपने' पुत्र के गौरवान्वित पिता होंगे !
विचारों की आँधी से स्वयं को दूर कर नंद ने मन को स्थिर किया।
उन्होने यशोदा की ओर देखा । वह थकान से प्रायः बेसुध ही थी।
वैसे यशोदा की प्रसूती के लिए एक और संभावना भी विचारणीय हैं।
संभवतः यशोदा की प्रसूति के समय धाय अथवा अन्य कोई था ही नहीं। प्रकृति के अनियंत्रित तांडव के कारण यशोदा की प्रसववेदना प्रारंभ होने पर भी नंद धाय को बुलाने नहीं जा पाए होंगे। वैसी स्थिति में यशोदा को अकेले छोड़कर जाना संभव नहीं था।
इसलिए, ना तो यशोदा के प्रसूति के संबध में कोई जान पाया होगा ना रात्री में घटित घटनाओं का कोई साक्षी रहा होगा।
अथवा यह भी संभव है कि कदाचित उसकी प्रसूती के लिए धाय उपस्थित होगी वा नाते की किसी महिला ने सहायता की होगी। इस स्थिति में नंद और वसुदेव ने उसे भी इस नाटक में भूमिका दी होगी और देवकी की धाय व सेविका जैसा इसे भी कंसमुक्ति अभियान का दायित्व दिया होगा !
उसका इस नाटक में केवल एक वाक्य का संवाद था की ,"मध्यरात्री के समय यशोदा के बेटा हुआ हैं!"
गोकुल भी तो कंस के राज्य का भाग था और उसके अत्याचारों से ग्रस्त था। और आकाशवाणी के पश्चात कदाचित नंद को उस अज्ञात धाय / सहेली से इतना सहकार्य सहजता से मिला होगा।
शुद्ध लौटने के पश्चात यशोदा ने अपने नन्हे शिशु को देखा, हृदय से लगाया और इतिहास के एक मनोरम आख्यान का प्रारंभ हुआ !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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