#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ३७ - दि. ३०.०६.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार 
भाग ३७ : दि. ३०.०६.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति को अपना धर्म प्रिय होता है। यहाँ तक विषय औचित्यपूर्ण है । 
समस्याओं का प्रारंभ तब होता हैं जब 'केवल हमारा योग्य है, अन्य सभी का अयोग्य' यह भावना प्रबल होती है ।

कोई भी व्यक्ती अथवा समुदाय का व्यवहार / शब्द / प्रकटीकरण जब श्रेष्ठत्व की इस भावना से प्रेरित होता है तब समाजजीवन नकारात्मकता से प्रभावित होता है तथा राष्ट्रधर्म बाधित होता है ।

अत्यंत महत्वपूर्ण व आश्चर्यजनक तथ्य यह हैं कि अन्य धर्मों के ग्रंथ, प्रथा - परंपराएँ इनपर टिप्पणी करनेवालों ने अधिकांश समय इन सबका अध्ययन नहीं किया होता हैं , सारी टिप्पणीयाँ इधर उधर से पायी गयी  (अथवा Google search से प्राप्त) होती है ।

हम हिंदुओं का एक अनुकरणीय गुण हैं सहनशीलता ! परंतु विशिष्ट परिस्थितियों में गुण भी अवगुण बन जाता हैं । विशेषकर ऐसी स्थिती में जब हमारी धार्मिक मान्यताएँ , प्रथा परापराएँ इनपर उंगली उठाई जाती हो !
लड़ाई - झगडा करने की बात नहीं, क्योंकि यह समाज जीवन में मतभेदों का समाधान नहीं देते हैं, किंतु अपने धर्म की निंदा करनेवालों को तर्कपूर्ण उत्तर देना यह धर्माचार भी है व कर्तव्य भी ! क्योंकि अन्याय करनेवाला तो दोषी हैं ही , अन्याय सहनेवाला तो उससे भी अधिक दोषी हैं !

किंतु यह तर्कशुद्ध उत्तर मन में अपनेआप ही नहीं आते हैं, इसके लिए ज्ञान चाहिए । वर्तमान समय में वेद पढना हर व्यक्ती के लिए संभव ना भी हो , किंतु वेदों के विषय में पढना , ऋषि - मुनि - विदुषियों के विषय में पढना तो संभव हो ही सकता हैं। हमारे घर में श्रीमद्भगवद्गीता होनी चाहिए , इसे पढना चाहिए , बच्चों को पढाना चाहिए । जिस You Tube में vlogs व movies देखते हैं उसी में कई channel हैं जिसमें गीतापाठ भी है । नियमित रूप से इसे सुनते रहेंगे तो यथासमय याद भी हो जाएगा । उदाहरण के लिए 'Geetagunjan'  यह channel हैं। गीता का अर्थ तो पढना ही हैं । जिसने भगवद्गीता ना समझी हो वह व्यक्ती क्या 'हिंदु' कहलाने योग्य भी हैं ? 
इसी प्रकार देवताओं के आख्यान व चरित्र , श्रीमद्भागवत आदि पढा जा सकता हैं, उनका अभ्यास किया जा सकता है ।

इस प्रकार ज्ञान में वृद्धी होने पर हम हिंदु धर्म पर उछाले जानेवाले प्रश्न व तिरस्कार का उत्तर देने में सक्षम होंगे । स्वरक्षा का अधिकार सभी का हैं, तो हमारे अपने प्रिय धर्म पर उठनेवाली उंगलियाँ नीचे करवाना यह पूर्णतः न्यायसंगत ही हैं, किसी अन्य के अधिकारों का हनन नहीं है ! 

हमें भय इसलिए हैं कि आलोचना करनेवाले के प्रश्नों को उत्तर देने योग्य ज्ञान हमें होता ही नहीं हैं! 
अपने अपने स्थान पर दुबक कर बैठने से कोई सुरक्षित नहीं रहता हैं , बाढ आने से पूर्व ही घर पक्का व दिवारे उँची करनी होती हैं, भीरुता से बिल में बैठे रहेंगे तब हार और मृत्यु निश्चित हैं !

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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