#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ४९- दि. १२.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ४९ : दि. १२ .०७ .२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
गंगा पार पँहुंचते ही श्रीराम -सीता-लक्ष्मण ने घने जंगलप्रदेश में प्रवेश किया।
उस युग में यह सारा प्रदेश असुरों के आतंक से ग्रस्त था। जिस प्रकार आधुनिक युग के आतंकवादी जनजीवन की हानी कर दहशत का वातावरण निर्माण करते हैं, उसी प्रकार वनवासी व आश्रमवासी असुरों के अत्याचार तले रौंदे जा रहे थे।
वनवास काल में श्रीराम ने ऋषियों के यज्ञ व तपस्या में असुरों द्वारा उत्पन्न किए जानेवाले विघ्नों का वर्णन सुना।
वनवासियों ने भी असुरों के क्रूर व बिभत्स व्यवहार की कथाएँ श्रीराम को कथन की !
राजा को प्रजा के कष्ट समझने के लिए संवेदनशील भी होना चाहिए व अत्याचारीयों के निर्दालन के लिए सक्षम, कठोर योद्धा भी!
इन असुरों के शक्तिस्थान पर ही आघात कर उसे समूल नष्ट करने का श्रीराम का संकल्प और भी दृढ होने में इस वनयात्रा का अत्याधिक महत्व है।
चित्रकूट पर्वत पर उन्होने ऋषि अत्रि व गुरुपत्नी अनसूया को राक्षस निर्दालन व भयंकर वन्यजीवों से वनचरों के संरक्षण का वचन दिया। इसके उपरांत उन्होने छत्तीसगढ के वनप्रदेश में काल व्यतीत किया था।
छत्तीसगढ के वनवासी आज भी शहर के सुखसुविधाओं से दूर अभावों का जीवन जी रहें हैं। उनकी जीवनपद्धति दया अथवा आक्षेप का कारण नहीं हो सकती, होनी भी नहीं चाहिए क्योंकि उनकी भी प्राचीन परंपराएँ हैं, उनके समाजजीवन के अपने नियम हैं व वे अपनी पद्धति के अनुसार अनुशासित जीवन जीते भी होंगे !
किंतु हर युग में यह होता हैं कि समाज की मुख्य धारा से दूर कहीं बसे हुए ऐसे समाज को बरगलाने में असामाजिक तत्वों को सफलता मिलती हैं जो साधारणतः राष्ट्रहित के विरोध में होती है !
उस युग में महाकौशल नाम से विख्यात इस भूभाग में रहने के मूल में प्रभु का ननिहाल के प्रति मोह नहीं था क्योंकि उन्हे तो महलो में नहीं ही रहना था!
महाकौशल से आगे वह तत्कालीन जनस्थान के नासिक भी गए। भारत के बीचोंबीच इस वनप्रदेश में रहकर प्रभु ने वनवासियों से आत्मिक नाता जोडा।
उन्होने इस वनप्रदेश में ऋषि मुचकुंद, ऋषि कंकर, ऋषि शरभंग, ऋषि गौतम, ऋषि गौतम, ऋषि अंगिरा, ऋषि सुतीक्ष्ण, ऋषि अगस्त्य आदि आश्रमों में तपस्वीयों के दर्शन किए, मार्गदर्शन व आशीर्वाद लिया।
अगस्त्य मुनी ने उन्हें अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए ।
प्राचीन भारत का कदाचित यह सबसे दुर्लक्षित पहलू हैं कि ऋषियों के आश्रम में शस्त्रशिक्षा भी दी जाती थी। भाषा, सौंदर्यशास्त्र, दर्शनशास्त्र, राज्यशास्त्र, तर्कशास्त्र अदि के साथ शस्त्र व अस्त्र संचालन की शिक्षा भी ऋषि ही देते थे। साथ ही इन आश्रमो में अस्त्र - शस्त्रोंपर संशोधन भी होता था (Reserch & Development - R & D)।
ऋषि स्वयं ब्राह्मण होने के कारण सामान्यतः शस्त्रसंचालन नहीं करते थे। शस्त्र ना चलाना ब्राह्मणों के लिए बाध्यता नहीं हैं, ना ही कभी थी । यह तो उनका स्वयंनिर्धारित बंधन हैं क्योंकी क्षात्रतेज से अधिकतः वृती की सात्विकता पर तामसिकता हावी हो जाती है।
किंतु क्षत्रियों को शस्त्रसंचालन की शिक्षा ऋषि ही देते थे। जैसे महारथी भीष्म व दृपदपुत्र धृष्टद्युम्न (जो द्रौपदी के भ्राता व कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों के सेनानी थे) के गुरु थे परशुराम , कुरु राजकुमार यांनी धृतराष्ट्र पुत्र व पांडव पुत्रों के गुरु थे द्रोणाचार्य, ब्राह्मण सुदामा के साथ क्षत्रिय श्रीकृष्ण व बलराम के गुरु थे सांदिपनी ऋषि....
प्रभु १४ वर्षों तक वनवास कर रहें थे। इतनी दीर्घ अवधि को कुछ दिनों की लेखमर्यादा में समेटना कठिन ही नहीं, असंभव हैं !
परंतु श्रीराम द्वारा उस युग के आतंकवादियों के विनाश की गाथा हम आगे बढाते रहेंगे क्योंकि हमारा सौभाग्य हैं कि हम आतंकवाद नष्ट करनेका प्रण करनेवाली संस्कृति के अनुयायी हैं, आतंक का वातावरण निर्मित कर सत्ता हथियाने की हिंदुओं की ना परंपरा हैं ना उद्देश !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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