#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ६६ - दि. २९.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ६६ : दि. २९.०७.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
रावण की मृत्यु के पश्चात का रामचरित्र सब जानते हैं और विवाद के सर्वाधिक चर्चित (विवादास्पद !) मुद्दे इसी भाग में है।
अनेकों का आक्षेप हैं कि अयोध्या लौटने से पूर्व श्रीराम ने सीताजी से अग्निपरीक्षा करवाई थी क्योंकि दीर्घकाल तक उनका वास्तव्य रावण जैसे कामांध राक्षस के घर में रहा था और राम तो अपनी पत्नी की 'शुद्धता' का प्रमाण चाहते थे।
त्रेतायुग हम में से किसी ने नहीं देखा हैं (वैसे हिंदु दर्शन के अनुसार आत्मा अमर होती हैं और वह जीर्ण शरीर बदल पुनः दूसरा शरीर धारण करती हैं अर्थात उसका दूसरा, तीसरा, चौथा.... ऐसे अनेक जन्म होते रहते हैं जबतक उसे पूर्ण मुक्ती ना मिले! तो हम सब त्रेतायुग में भी थे परंतु हमें उस जन्म का स्मरण नहीं हैं। और तब हम किस स्थान के निवासी थे यह भी अज्ञात ही हैं। अर्थात उस युग की घटनाओं के संबध में हम आज स्पष्ट विधान नहीं कर सकते हैं।)
त्रेतायुग का इतिहास भी प्रमाण सहित उपलब्ध नहीं हैं। इससे पूर्व भी हमने चर्चा की थी कि इतिहास के जतन संबधी विश्वभर में अनास्था हैं और परिणामस्वरूप इतिहास के संबध में जानकारी अधूरी हैं। ऐसे में अनेक प्रसंग / मुद्दे / घटनाएँ आदि के संबध में तर्कबुद्धी का ही आधार होता हैं।
श्रीराम द्वारा सीताजी की अग्निपरिक्षा यह अनेकों (आलोचकों) के लिए अत्यंत प्रिय विषय हैं। क्योंकि इसमें अन्य भी अनेक मुद्दे अंतर्भूत हैं जैसे-
(१) पुरुषप्रधान संस्कृती में पुरुषों द्वारा स्त्रियों की योनिशुचिता का आग्रह होना।
(२) श्रीराम द्वारा पत्नी को अपनी शुद्धता सिद्ध करने का आव्हान देना जो पुरुष द्वारा स्वयं को श्रेष्ठ मानकर स्त्री को हेय मानने की हीन विचारधारा का प्रतिक है।
(३) सार्वजनिक रुप से पत्नी की अग्निपरिक्षा करवाना अर्थात समाज के सामने उसे लज्जित करना।
(४) अग्निपरिक्षा में निहित तत्व अर्थात इसमें अपयश होनेपर सीताजी का अग्निसात होना अर्थात मृत्यु अथवा श्रीराम द्वारा उन्हे अयोध्या ले जाने की अस्वीकृती अर्थात उनका त्याग करना।
उपरोल्लिखित मुद्दे उठानेवालों की भावना समझ में आती हैं क्योंकि सीताजी के इस प्रकार के अपमान का विचार मानसिक पीडा देनेवाला हैं।
वस्तुतः ऐसे सब लोग श्रीराम के इतिहास को पृथक पृथक टुकडों में देखते है इसलिए श्रीराम के व्यक्तित्व का यथार्थ चित्र उन्हे वैसे ही नहीं दिखता हैं जैसे दिखना चाहिए ।
हमने अहल्या उद्धार के संदर्भ में (भाग ४३ : दि. o६.०७.२०२३ ) देखा था की बलात्कारित होने के कारण तत्कालीन समाज ने उसे पतित मान लिया था। तब पुत्र के भविष्य के लिए अहल्याने स्वयं पति - पुत्र से दूर एकाकी जीवन जीने का मार्ग अपनाया था। तत्कालीन समाज ने अहल्या को अपराधी नहीं परंतु पतित अवश्य माना था और उनके इस प्रकार एकाकी (बहिष्कृत ! ) जीवन का सबने (मूक) समर्थन किया था।
परंतु श्रीराम ने उन्हे समाज में पुनर्प्रतिष्ठित किया था।
वह श्रीराम, जो अहल्या की अनकही व्यथा को समझ पाए थे, बलात्कारिता होने के की अहल्या की वास्तविकता को जिन्होने कलंक नहीं माना था और उनके समाजबहिष्कृत जीवन की पीडा को अनुभव कर जिन्होने अहल्या को पुनः गौरवपूर्ण जीवन देने की पहल की थी, वे श्रीराम अपनी ही पत्नी पर इस प्रकार उँगली उठाएंगे ?
उनसे शुद्धता सिद्ध करने की अपेक्षा करेंगे ?
श्रीराम के चरित्र के प्रत्येक पृष्ठ पर उनके अन्य मनुष्यों के संबध में विशाल और निर्मल दृष्टीकोण की छाप अंकित है ..
अयोध्या का युवराज होते हुए भी उन्होने ऐसी कन्या से विवाह किया था जिसके माता- पिता, कुल-गोत्र संबधी कोई जानकारी नहीं थी। सीताजीके जन्म की परिस्थितियाँ समाज के रूढ नियमों की व्याख्या में 'पाप' होने की संभावना भी तो थी ! परंतु श्रीराम के लिए इन सबका विचार आवश्यक नहीं था। वह तो व्यक्ति के अपने संस्कार, गुण और चरित्र को ही महत्व देते थे। और सीताजी का पति के प्रति संपूर्ण समर्पण, निष्ठा, उनका मनोनिग्रह भी तो जानते थे राम क्योंकि यह उनकी वह सहचारिणी थी जिसने स्वेच्छा से उनके साथ वनवास किया था, भौतिक सुखों का त्याग कर वह अपने प्रिय पति की अनुगामिनी बनकर एक अनिश्चित भविष्य की ओर निकल पड़ी थी।
और वह सीता, जिसने बाल्यावस्था में ही साक्षात शिवजी का धनुष्य एक ही हाथ से उठा लिया था वह रावण की कामेच्छा की बली चढ़े यह क्या संभव था ?
श्रीराम अपनी प्रिय पत्नी से पूर्णतः परिचित थे। इसलिए उनके द्वारा सीता को शुद्धता सिद्ध करने के आग्रह का प्रसंग निःसंशय भ्रामक हैं।
हमने इससे पूर्व भी चर्चा की थी की नाटक पूर्ण करने के लिए जैसे प्रवेश आवश्यक होते हैं उसी प्रकार रावण के विनाश के लिए देवपक्ष द्वारा सीताहरण का प्रवेश रखा गया था और सीताजी रावण के अत्याचारों की बली ना चढ़े इसका समुचित प्रबंध भी किया गया था।
वैसे रामकथा श्रद्धालुओं के लिए ही हैं। आस्तिक व्यक्ति भगवान के अवतार में विश्वास करते हैं इसलिए श्रीराम को वह विष्णु के अवतार के रूप में देखते हैं। अर्थात सीताजी भी लक्ष्मी का रुप हैं। ऐसे में भगवान विष्णु द्वारा माँ लक्ष्मी के सार्वजनिक अपमान का प्रसंग सोचा भी नहीं जा सकता है !
और नास्तिक व्यक्ति के लिए राम सत्य नहीं हैं, उनके विष्णुरूप होने की संभावना नहीं है, राम द्वारा किया गया लोककल्याण भ्रम हैं और स्त्रियों के प्रति उनकी पूज्य भावना और विश्वास मात्र दिखावा हैं !
जिन्होने स्वयं आँखो में पट्टी बांध रखी हैं उनके लिए रामचरित्र से क्या जानना या क्या सीखना ?
परंतु हम श्रद्धालु जन श्रीराम की जयजयकार करने को भी उनकी कृपा ही मानते रहेंगे 🙏🏼।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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