#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ६२ - दि. २५.०७.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ६२ : दि. २५.०७.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

सीताहरण के पश्चात श्रीराम ने अत्यंत शोक किया।
आश्चर्य हैं ! 
वह इसकी अपरिहार्यता जानते थे, अथवा राक्षसों के आतंक से मुक्ती दिलाने के लिए ही उनका अवतार था और उनकी पत्नी का हरण का निमित्त इसके लिए आवश्यक था, तो श्रीराम ने इतना विलाप क्यों किया ?

क्योंकि मानवरूप में अवतरित होने पर मानव जीवन की मर्यादा, पद्धतियाँ मानना अपरिहार्यता है। नाटक में पात्र अपनी भूमिका निभाते हैं उसी दृष्टी से इसे देखा जा सकता हैं।
और किसी भी पुरुष के लिए पत्नी के अपहरण का शोक ना होना क्या संभव हैं ?

जैसे हम पहले ही देख चुके हैं, सीताजी वन्यसामग्री से निर्मित अपने अलंकार मार्ग में बिखेरती गई और उनकी विशिष्ट बनावट से उनकी स्वामिनी की पहचान हो पाई होगी।

बताया जाता है कि सीता हरण रोकने का प्रयत्न जटायु ने किया था जो एक गिद्ध (Vulture) था। इसपर पुनर्विचार किया जा सकता है। जैसे नागालैण्ड में धनेश पक्षी (Hornbill) को मारकर उसकी चोंच टोपी में लगाने की परंपरा है (परंपरा थी कहना उचित होगा क्योंकि आजकल इस पक्षी के संरक्षण के लिए नागालैण्डवासी सहमत हो रहें हैं) उसी प्रकार कदाचित किसी वन्य समूह में गिद्धों के शरीर से टोपी - अलंकार आदि बनाते होंगे जिनके कारण उस वन्य मानवसमूह का नाम गिद्धों पर रखा गया हो सकता है।
पुरातन काल के संबध में संपूर्ण जानकारी उपलब्ध ना होनेपर तर्क करना यही उपाय है।

श्रीराम लक्ष्मण जटायु का अंत्यविधि कर पंपा सरोवर के निकट शबरी आश्रम में गए और आगे ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव व सहयोगी वानरों से उनकी भेंट हुई।

अपने ज्येष्ठ बंधु किष्किंधा सम्राट वाली द्वारा निर्वासित किए जाने और  वालीद्वारा सुग्रीव की पत्नी रुमा को बलपूर्वक अपनी पत्नी बनाने के संबध में उन्हे सुग्रीव ने ही बताया। 
श्रीराम ने उन्हे सहायता का वचन दिया। 

श्रीराम के कहने पर सुग्रीव ने वाली को युद्ध के लिए संदेश भेजा। 
वाली क्रोधित भी हुआ और चकित भी ! सुग्रीव में ना तो इतना बल था ना साहस की वह वाली से युद्ध कर उसे पराजित कर सकता। सुग्रीव द्वारा यह पहल तो मृत्यु को आमंत्रण ही मानी जा सकती थी। 

क्रोधित वाली सुग्रीव से द्वंद्वयुद्ध के लिए आया। उचित समय श्रीराम का बाण वाली के मर्मस्थल में जा लगा। वाली ने इस के लिए राम से ही प्रश्न किया की उनसे राम की शत्रुता ना होनेपर भी उन्होने बाण मारा और वह भी सीधे युद्ध में नहीं, छिपकर मारा, क्या यह अधर्म नहीं है ?

राम ने कहा की वाली ने अपने अनुज (कनिष्ठ बंधु/ छोटा भाई) की पत्नी को बलपूर्वक अपनी पत्नी बना लिया था और जो व्यक्ती दूसरे की पत्नी को (उसकी इच्छा के विरुद्ध) अपने अंतःपुर में खींच लेता है उसे न्याय की दुहाई देने का अधिकार नहीं हैं !

श्रीराम की विचारधारा स्पष्ट है। धर्मपालन आवश्यक है, किंतु अधर्मियों के निर्दालन के समय मात्र धर्मपालन का बाधा नहीं बनने देना चाहिए, वरन् धर्म के मर्म को समझकर विजय पाना ही आवश्यक हैं । ऐसे समय में धर्म की रुढ व्याख्याओं को बाधा नहीं बनाया जा सकता हैं❗

श्रीरामचरित्र का यह अत्यंत विचारणीय पहलु है !

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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