#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ५५ - दि. १८.०७.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ५५ : दि. १८.०७.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

हिंदुओं के लिए हनुमानजी भक्तों की सर्वोच्च श्रेणी में आते हैं क्योंकि उन्होने श्रीराम को अपना सर्वस्व मान लिया हैं। 
परंतु श्रीराम से भेंट के पूर्व उनके जीवन पर विचार करनेपर यह ज्ञात होता हैं कि वे अपने आराध्य देवता की संपूर्ण शरण में आए उससे पूर्व उन्होने अपने आप को इतना समर्थ बनाया था की श्रीरामजी इतने बलिष्ठ, बुद्धीमान और विनम्र भक्त को पाकर अति प्रसन्न हुए !

हनुमानजी वानर समाज में 'यूथपति' थे अर्थात समाज के विशिष्ट भाग के नायक / मुख्य (वानरयूथमुख्यम् ऐसा उनका वर्णन हैं)। इससे हम समझ सकते हैं कि उनमे नायकोचित शौर्य व विचारों की प्रगल्भता रहीं होगी। 
वह ब्रह्मचारी अवश्य थे परंतु इसका अर्थ निर्धनता नहीं होता हैं।
किष्किंधा वानर समाज की राजधानी थी इसलिए संभवतः नगर में उनका प्रासाद / भवन रहा होगा। 

असुरों के साथ मित्रता की वाली की नीति सुग्रीव को मान्य नहीं थी। असुरों के साथ राजा की मित्रता का मूल्य प्रजा को चुकाना पडता हैं। इसलिए सुग्रीव ने किष्किंधा नगरी से दूर जाने का निर्णय लिया।
वे किष्किंधा से निकलकर मतंगवन में रहने लगे (क्योंकि यहाँ वाली के लिए प्रवेश निषिद्ध था। राक्षस दुंदुभि की मृत्यु के समय वाली द्वारा आश्रम की अमर्यादा करने के अपराधस्वरूप उन्हे इस आश्रम परिसर व इसके निकट प्रदेश में प्रवेश की अनुमति नहीं थी ।वाली असाधारण रुप से बलिष्ठ थे, मल्लयुद्ध या गदायुद्ध किसी भी प्रकार उनपर विजय पाना सुग्रीव के लिए संभव नहीं था इसलिए वह मतंग आश्रम के निकट आकर रहने लगे)।

इस निर्णय में हनुमानजी ने उनका साथ दिया। वे भी नगर का सुविधापूर्ण जीवन त्यागकर सुग्रीव के साथ वन में रहने लगे।

विचारणीय बात हैं कि हनुमानजी ने सुग्रीव का साथ दिया, वाली का नहीं ! एक अकेला प्राणी, ना पत्नी ना बच्चे... उनकी आवश्यकताएँ मर्यादित ही रही होंगी। ऐसे में किष्किंधा नगरी में रहकर वाली का साथ देना अथवा उसके कृत्यों की ओर तटस्थ रहना संभव था और सुविधाजनक भी!
परंतु हनुमानजी ने राजधानी छोड़कर सुग्रीव का साथ दिया। उनकी न्यायबुद्धी का यह सर्वप्रथम दृश्य प्रमाण कहा जा सकता हैं।

वालीवध के पश्चात सुग्रीव के राज्याभिषेक समारोह में रामलक्ष्मण उपस्थित नहीं थे क्योंकि वनवास काल में उनके लिए नगर प्रवेश निषिद्ध था। परंतु वानरों का राजपद पाकर सुग्रीव को श्रीराम को दिए गए वचन का विस्मरण हुआ व सीताशोध में सहायता का दायित्व उन्होने नहीं निभाया। इस काल में श्रीराम - लक्ष्मण के साथ संपर्क बनाए रखाने का महत्कार्य हनुमानजी ने किया हैं। 
सुग्रीव के राज्य में अधिकार मिलने से हनुमानजी अधिक सक्रीय बने थे। वानर प्रजाति के हित के लिए, राक्षस निर्दालन का महत्व समस्त मानवजाति के संदर्भ में जानकर व श्रीराम लक्ष्मण की असाधारण क्षमता को मन ही मन पहचानकर उनके मन में श्रद्धा - भक्ती के अंकुर लहलहाने लगे थे !

युगान्तरों तर चलनेवाली हनुमानजी की भक्तिगाथा का वर्णन कोई कैसे करें ! 
ऐसे महान भक्त को शब्द में बांधना तुच्छ मानव के लिए असंभव हैं !

फिर भी हम उनकी अपूर्व गाथा के रस का मधुपान करने का प्रयत्न अपनी क्षमताभर करेंगे 🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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