#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ३० - दि. २३.०६.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ३० : दि. २३.०६.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
हिंदु धर्म में देवी को प्रेम से देवीमाँ, मातारानी इन नामों से संबोधित जाता हैं क्योंकि माता / मातृशक्ती प्रेम का विशुद्ध रुप हैं।
वस्तुतः देवी के रुप, सामर्थ्य व शक्तियाँ kaleidoscope समान हैं, वह अमर्याद हैं !
हम आज से 'देवी आख्यान' का आरंभ कर रहे है। यह आख्यान मुख्यतः 'श्री दुर्गासप्तशती' पर आधारित है।
सप्तशती के प्रारंभ के 'देवीकवच' में साक्षात ब्रह्मदेव कथन करते हैं कि सर्व प्रकार के संकटो का हरण करने का सामर्थ्य देवी में हैं, देवी के भक्तों का भाग्योदय निश्चित हैं, आवश्यकतानुसार देवी रौद्र रुप धारण करती हैं तथा शत्रुओं का नाश करती हैं, वह कुल - संपत्ति व संतति का रक्षण करती हैं तथा यश, किर्ती, आरोग्य, धन व विद्या प्रदान कर उनका रक्षण भी करती हैं, वह व्यसनों से मुक्ती देती हैं!
सोचिए, साक्षात विश्वनिर्माता ब्रह्मदेव देवी माँ की कितना अद्भुत वर्णन कर रहें हैं !
पुनरुच्चार / पुनरुक्ति का दोष तो हैं , किंतु सोचिए, हिंदु धर्म में परमात्मा (परम् + आत्मा) के स्त्रीरूप की कितनी भव्य कल्पना / वर्णन हैं ! इसी से हिंदु धर्म की स्त्री संबधी धारणाएँ और अधिक उज्वल रुप में उभरकर आती हैं ।
हर समाज में दुष्ट, कुबुद्धि लोग तो होते ही हैं। वे विभिन्न प्रकार के अपराध भी करते हैं। परंतु उनका व्यवहार - उनके अपराध हमारी संस्कृती में स्त्रियों के प्रति भावना का प्रतिबिंब नहीं हैं ! उनके द्वारा किए गए अपराध उनकी मानसिकता / विकृती दर्शाते हैं।
हमारे धर्म - संस्कृती में स्त्रियों के प्रति आदरभाव व निर्मल दृष्टीकोण का एक उदाहरण हैं
स्त्रियों की वेशभूषा !
प्राचीन भारत में स्त्रियों की वेशभूषा सामान्य हुआ करती थी। कंचुकी के उपर उत्तरीय (ओढनी ) और अधरीय अर्थात कटिवस्त्र (कमर पर बांधनेवाला वस्त्र - घागरा / धोती समान)।
मस्तक से संपूर्ण देह को ढकने वाले वस्त्र, मस्तक पर पल्लू अथवा घूंगट यह प्रथा साधारणतः १००० - १२०० वर्ष पूर्व तक नहीं थी।
स्त्रियों की वेषभूषा मर्यादानुसार थी किंतु स्त्री देह को अत्यधिक रुप से ढकने की प्रथा नहीं थी।
परकी आक्रमकों के भारत प्रवेश के पश्चात स्थिति बदलने लगी। इन आक्रमकों की स्त्री संबधी कल्पना उपभोग्या व गुलाम की थी। वासनाओं की तीव्रता व धन / शक्ती का आधार इस कारण उनके अत्याचारों की आँच में हिंदु स्त्रियां भी जलने लगी।
चूंकि इन परकियों की कुदृष्टी हमारी माता, बहन, बेटी - बहुओं पर पडने लगी, स्त्रियों पर बंधन बढने लगे। स्त्रियो का घर की चौखट लांघना कम होने लगा, उनकी घुटन का प्रारंभ मस्तक पर पल्लु / घुंगट से हुआ तथा परदा प्रथा में मान्य हो गई !
वैदिक परंपरा की निर्भय, विद्यावती स्त्री को दयनीय / पुरुषों की आश्रिता बनने की पृष्ठभूमि यह हैं 👆🏼।
हमारी प्राचीन परंपरा तो विद्वत्चर्चा मे भाग लेनेवाली विदुषियों के, युद्ध में पति की सारथि बनी पत्नी के (राजा दशरथ की पत्नी कैकयी), पुत्रहीन पिता के राज्य का भार स्वयं लेकर पुत्र के राजा बननेतक राजधर्म निभानेवाली कन्या के (मणिपुर की राजकन्या अर्जुनपत्नी चित्रांगदा) आख्यानों का उत्सव मनाती हैं !
इस काल में शांति - अहिंसा का जयजजयकार बढने लगा था। वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में यह तत्व आकर्षणीय हो सकते हैं परंतु संभवतः इसी कारण हिंदुओं का क्षात्रतेज लुप्त होने लगा।
जिस धर्म में समाज के स्वास्थ्य के लिए विविध कार्यों की व्याख्या कर कर्तव्य बाँट दिए थे,
उसी समाज में क्षत्रियों ने राष्ट्ररक्षण - प्रजारक्षा का धर्म त्यागकर शांति का जाप प्रारंभ किया । परिणामतः का इस काल में ही हुए एक के पश्चात एक परकीयों के आक्रमणों का प्रतिकार तथा अत्याचारी विदेशियों को देश के बाहर ही रोकने में हम हिंदु असमर्थ रहें यह कडवी और दुखद सचाई है।
हम भारतवासी अनुभव कर चुके हैं कि आतंकवादियों को शांति-प्रेम के संदेश से रोकना संभव नहीं होता हैं, कहावत हैं कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते !
क्षत्रियों के कर्तव्यच्युत होने की कीमत हमारे राष्ट्र ने एक हजार वर्ष के दास्यत्व से चुकाई हैं!
इस पार्श्वभूमी को देखे तो वत्सल माता के साथ शत्रुमर्दिनी देवी के वंदन के लिए सहज ही हाथ जुडते हैं 🙏🏼
आज के भारत के हिंदुओं में स्त्रियों की स्थिती और इतिहास से पाठ लेकर उज्वल भविष्य की ओर बढने संबंधी विचारविमर्श के सत्र क्रमशः आगे बढते रहेंगे....
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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