#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ६९ - दि. ०१.०८.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ६९ : दि. o१.०८.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

श्रीकृष्ण के जन्म की परिस्थितियाँ अद्भुत हैं !

मथुरा के राजा उग्रसेन की कन्या देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ। बताया जाता हैं कि इस विवाह के समय आकाशवाणी हुई थी जिस में देवकी के आठवें पुत्र के हाथों अपने मामा कंस की मृत्यु की भविष्यवाणी की गई थी (जिसे आकाशवाणी कहा जाता है वह संभवतः किसी ज्योतिषी द्वारा की गई भविष्यवाणी थी !

सुनकर राजकुमार कंस अति क्रोधित हुआ और उसने देवकी को मारने के लिए  खङग् उठाया। वासुदेव ने उसे रोका और आश्वासन दिया की देवकी की प्रत्येक सन्तान को वह जन्म लेते ही कंस को सौंप देंगें और कंस का उसके संबध में निर्णय मान्य करेंगे। 
कंस ने देवकी की हत्या का विचार तो त्याग दिया परंतु वसुदेव - देवकी को कैद में रख दिया। 
कंस ने देवकी के प्रत्येक बच्चे की जन्म पश्चात त्वरित हत्या कर दी। परंतु आठवे पुत्र को पिता वसुदेव ने सुरक्षित मथुरा पँहुचा दिया और गोकुल में कृष्णलीलाएं शुरु हुई !

इतना सामान्य कथाभाग सभी को ज्ञात हैं। परंतु वसुदेव - देवकी के विवाह के समय प्रदेश के राजकीय और सामाजिक पटल का चित्र कैसा था यह देखना भी आवश्यक है ।

मथुरा के राजा उग्रसेन थे परंतु शासन उनके पुत्र कंस के मनोनुकुल ही होता था। अंत में कंस ने पिता को कारागृह में डाल दिया और स्वयं राजा बन बैठा।
कंस की वृत्ती असुरों समान थी। उसे अपने श्वसुर अर्थात जरासंध का समर्थन भी प्राप्त था। 
मगधराज जरासंध बलवान व पराक्रमी थे। परंतु राज्यकर्ता के कर्तव्यों के विपरित उनका अन्यायपूर्ण वर्तन था !
इसका एक उदाहरण उनके द्वारा ८६ राजाओं को बंदी बनाने का हैं। वह १०० राजाओं की बली चढाकर स्वयं चक्रवर्ती सम्राट बनना चाहते थे।
इस अत्याचारी राजा की दो पुत्रियाँ अस्ति और प्राप्ति कंस से ब्याही थी। जरासंध का समर्थन पाकर कंस अत्याचार व दमन की सीमाएँ  पार करने लगा था। केवल मथुरा नगरी ही नहीं, संपूर्ण राज्य की प्रजा पर अत्याचार हो रहे थे।

इस पार्श्वभूमी को देखते हुए हम समझ सकते हैं कि -
'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिरभवति भारत ।
अभ्युथामधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहमं ॥
परित्राणाय साधूनाम्
विनाशाय च दुष्कृताम ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥ ' 
(अर्थात जब जब धर्म का नाश होता है - अधर्म बढ़ने लगता हैं - तब तब धर्म को पुन: प्रस्थापित करने के लिए मैं जन्म लेता हूँ । सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्ट कृत्यों को रोकने लिए और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए में प्रत्येक युग में जन्म लेता हूँ।)

👆🏼 यह श्रीकृष्ण ने अनेको वर्षों के पश्चात गीता में बताया। परंतु अपने वचनों की सत्यता सिद्ध करने का प्रारंभ उन्होने अपने जन्म से ही किया था।

द्वापारयुग के उस खंड में श्रीकृष्ण के कारण राजकीय, सामाजिक और वैयक्तिक आदर्श भी जिस प्रकार पुनःप्रकाशित हो पाएं इस पर हम विचार करते रहेंगे।

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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