#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ४० - दि. ०३.०७.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार 
भाग ४० : दि. ०३.०७.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

प्रभु श्रीराम का चरित्र हम सब जानते हैं। अतः हम कथाभाग ना देखते हुए प्रभु के उज्वल व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करेंगे।

श्रीरामजी के चरित्र का अत्यंत गौरवपूर्ण भाग है उनका सबके प्रति प्रेम। 
यह प्रेम उनके कुटुंब - संबंधियों तक सीमित नहीं था, वह व्यक्ति का कुल, रुप, व्यवसाय, सांपत्तिक स्थिती इनपर निर्भर नहीं था। श्रीराम का अन्य सबके प्रति प्रेम उनके स्वभाव की उदारता व उनके मन की मृदुता का परिचायक हैं।

वैसे, प्रेम की व्याख्या क्या है ?
बहुमूल्य उपहार भेंट करना अथवा प्रशंसाभरे शब्दों से किसी की जयजयकार करना यह श्रीराम के प्रेम की रीत नहीं हैं, वह दुखियों का दुख हरण करते हैं, सुखी व्यक्तियों को प्रेम से जीवन आगे बढाने को प्रेरित करते हैं व उपेक्षितों को समाज में पुनर्स्थापित करते हैं !
हम उदाहरणों के माध्यम से देखेंगे।

राजा दशरथ की तीन रानियों के अतिरिक्त उनके अंतःपुर में अनेक स्त्रियाँ थी। उस काल के क्षत्रियों में यह मान्य हुआ करता था। इनमें सामंतकन्याएं , श्रेष्ठिकन्याएँ भी रही होंगी। यद्यपि उन्हे राजा के अंतःपुर में सुस्वादु भोजन व वस्त्राभरण - अलंकार प्रचुर मात्रा में मिलते रहे होंगे, किंतु जैसे कोई भी कल्पना कर सकता हैं, इन कन्याओं को / स्त्रियों को दांपत्य जीवन का सुख, अपत्यप्राप्ति का सुख नहीं ही मिल पाया होगा।

आज्ञाकारी पुत्र राम ने इसके लिए कभी भी पिता की आलोचना नहीं की, परंतु इन अभागी स्त्रियों के करुण वास्तव को समझने की पावती उन्होने अपनी पद्धति से दी हैं, स्वयं एकपत्नीव्रत अंगिकार कर !

श्रीराम अयोध्या के युवराज थे। उस युग के प्रत्येक राजकुल की मनिषा रहीं होगी ईक्ष्वाकु वंश के युवराज से कन्या का विवाह करने की। परंतु श्रीराम ने अपने एकपत्नीव्रत की घोषणा कर दी थी।
और विवाह किया भी तो किससे ?
राजा जनक की पालिता पुत्री से!
सीता का कुल अज्ञात है। खेत में एक पेटिका में मिली थी वह नवजात बच्ची। उसके जन्म के संभावनाएँ अनंत है व इनमें से अनेक संभावनाएँ सभ्य समाज के लिए तिरस्करणीय भी हो सकती हैं।
सोचिए , आज भी कितने लोग सहजता से स्वयं के लिए अथवा पुत्र के लिए अथवा अपने परिजनों में किसी के लिए ऐसी अज्ञातकुलशीला कन्या पत्नी के रूप में स्वीकार करेंगे ? 

सीता का पालनपोषण राजा ने किया तो क्या हुआ, इतिहास उसके माता -पिता - कुल के विषय में मौन हैं, उनके जन्म की स्थिति व उसे त्यागने के निरुपाय के विषय में कोई सूचना नहीं। क्या यह सब उसके विवाह के मार्ग में बाधा उत्पन्न करने के विकट कारण नहीं थे ?

यहाँ राम तो अयोध्या के भावी राजा थे ! अत्यंत प्रतिष्ठित रघुकुल के राजा के ज्येष्ठ पुत्र ! उनकी पत्नी बनने के लिए उस युग की प्रत्येक राजकन्या पलक - पाँवडे बिछा देती !

किंतु प्रभु ने उस अज्ञात कुलशीला कन्या को पत्नी बनाया ! ऐसा भी नहीं था की वे सीता के रुप - गुण पर मुग्ध थे, उन्होने तो सीता को देखा भी नहीं था। 
इसके उपरांत भी क्यों किया ऐसी अनाथ कन्या से विवाह ?

समाज में जिन्हे कभी उपेक्षा व अपमान मिलने की संभावना हो, उन्हे समाज जीवन में सुप्रतिष्ठित करने का यह सर्वाधिक गौरवपूर्ण उदाहरण हैं !

इन्हीं माता सीता को लेकर प्रभु के लिए अनेक प्रश्नचिन्ह रखे जाते हैं.... संदर्भ के अनुसार आगे उनपर भी विचार करेंगे ।

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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