#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ५८ - दि. २१.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ५८ : दि. २१.०७.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
नल - नील
रामायण में रामसेतु का बहुत महत्व हैं। मान्यता हैं कि श्रीराम सागरदेवता की प्रार्थना तीन दिनों तक करते रहे, इसलिए कि वे उन्हे लंका जाने का मार्ग दे।
परंतु सागरदेवता द्वारा ऐसी पहल का लक्षण ना देखकर श्रीराम अति क्रोधित हुए व उन्होने बाण चलाकर सागर को सुखाने के लिए धनुष उठाया। भयभीत सागर ने सेतु बनाने का उत्तम मार्ग बताया। वानरसेना में नल और नील नामक दो वानर थे जिन्हे यह कार्य सौंपा गया।
बताया जाता हैं कि नल - नील को मिले हुए एक शाप के कारण यह कार्य उनके लिए संभव हुआ। वे दोनो ही बाल्यावस्था में अत्यंत नटखट थे। आसपास के ऋषियों के आश्रम में जाकर वहाँ से वस्तुएँ उठाते और नदियों में फेंक देते थे। बाल्यावस्था में यह उनके लिए केवल क्रीडा थी। परंतु ऋषियों को इससे असुविधा ही होती थी। एक ऋषि ने उन्हे श्राप दिया कि अब तुम दोनो किसी भी वस्तु को पानी में डालोगे तब भी वह डूबेगी नहीं, पानीपर तैरती रहेगी।
मान्यता हैं कि इसी श्राप को श्रीराम ने वरदान बनाया व उन दोनों से रामसेतु का निर्माण कराया।
👆🏼 यह रहा कथाभाग जिसे किर्तनों में बताया जाता हैं और जो भक्तीउन्मुख है !
परंतु इतिहास की दृष्टी से यदि हम तर्क करें तो रामायण नामक इतिहास व नल - नील की व्यक्तिरेखाएं कदाचित थोडे भिन्न प्रकाश में देख पाएं यह भी संभव है !
वानरसेनासहित लंका जाने की आवश्यकता देखकर श्रीराम ने सेतु निर्माण का विचार किया होगा। इसके लिए उपयुक्त स्थान का शोध पहले उन्होने तमिलनाडू में कोडीकरई के निकट किनारे पर किया। वहाँ पर ऐसी संभावना ना पाए जानेपर शोध करते हुए वह रामेश्वरम के निकट पँहुंचे जहाँ धनुष्कोडी का स्थान उपयुक्त पाया गया।
श्रीराम द्वारा सागर की प्रार्थना तीन दिनों तक करने का यही तीन दिन का कालावधि भी हो सकता हैं। कथारूप में हम जिसे सागरप्रार्थना कहते हैं, इतिहास की दृष्टी से वहीं काल सेतु बनाने की अभियांत्रिक (Engineering) आवश्यकताओं के अनुरूप स्थान का शोध करने का भी तो हो सकता हैं !
रही नल नील के श्राप की बात तो यह दंतकथा भी हो सकती हैं। कदाचित उन्होने अभियांत्रिकी की विधिवत शिक्षा भी ली होगी। कदाचित किष्किंधा में अथवा अन्य किसी राज्य में जाकर...
उस युग में विशाल प्रासाद बनाए जाते थे तो अभियांत्रिकी की शिक्षा की व्यवस्था तो होगी यह माना जा सकता हैं।
प्रश्न हैं हमारी मान्यताओं को प्रश्नों के लिए खुला रखने का ..
अभी अभी १०० वर्ष पूर्व तक हम केवल २७०० - २८०० वर्ष पूर्व तक की संस्कृतियों के संबध में ही जानते थे अर्थात भगवान बुद्ध के समय तक (इसापूर्व ६०० वर्ष)।
हडप्पा और मोहेंजोदारो की खुदाई का प्रारंभ १९२० में हुआ तब हमने जाना की बुद्ध काल से भी संभवतः १३०० से २००० वर्ष पूर्व इतनी प्रगत संस्कृतियां सप्तसिंधुओं के प्रदेश में थी। रामायण - महाभारतकालीन ऐसे अवशेष मी जमीन अथवा पानी के नीचे दबे होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
तो संभवतः अभियांत्रिकी का उच्च शिक्षण देनेवाले विद्यापीठ उस काल में भी थे और नल - नील ने वहीं से शिक्षा प्राप्त की थी।
इस तथ्य को माननेपर यह बात स्पष्ट होती हैं कि सामान्यतः पिछडी हुई वानरजाति के दो युवकोने बुद्धीमत्ता व परिश्रम से उच्च शिक्षा भी ली थी व उसका अत्यंत उदात्त कार्य के लिए उपयोग कर समाजसेवा भी की थी। वनवासी राम के पास उनकी सेवा का मूल्य देने के लिए धन तो था नहीं, परंतु समाज के लिए राक्षससंहार के महत्व को जानकर उन दोनो ने कदाचित विनामूल्य सेवाएँ दी हो!
अद्भुत है रामचरित्र!
राम के संपर्क में आते ही शुद्ध चरित्र के सामान्य जन भी मौल्यवान माणिक समान अपनी प्रभा बिखेरते हैं 🙏🏼
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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