#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ७९ - दि. ११.०८.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ७९ : दि. ११.०८.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

वसुदेव से मित्रता के कारण उनकी पीडा को नंद जानते होंगे.... 
इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का कोई हल निकालने के लिए दोनो ने विचार किया होगा....
नंद ने वसुदेव को आश्वासन दिया होगा की वह उन दोनों की हरसंभव सहायता करेंगे....

वसुदेव कदाचित झिझके होंगे क्योंकि किसी से सहायता लेने का अर्थ उनका संकट बढाना भी हो सकता था।
परंतु और कोई उपाय नहीं था। मातृभूमि की रक्षा के लिए लडनेवाले सैनिक जैसे एक दूसरे के अनिष्ट की आशंका को जानते हुए भी एकसाथ डटकर खड़े रहते है उसी प्रकार वसुदेव और नंद ने इस संकट से बचने का मार्ग सोचा था। वसुदेव तो कंस के क्रोध के कारण निर्माण होनेवाले संकट झेल ही रहे थे, अब नंद को भी कंस के क्रोध की उसी अग्नि में झोंकना यह एकमात्र मार्ग था !

देवकी की सांतवी संतान को रोहिणी के गर्भ में रोपित कर वसुदेव ने उन्हे नंद के पास गोकुल भेज दिया।
बलराम का जन्म वहीं हुआ। वसुदेव - रोहिणी के इस पुत्र को नंद का संरक्षण मिला और वह गोकुल में पलने लगा।
इस सफलता से कदाचित वसुदेव और  नंद का धैर्य बढ गया होगा और उन्होने इससे भी अधिक कठिन योजना बनाई होगी।
हम उस घटना के पट का विचार करेंगे 👇🏼

मथुरा और गोकुल दोनो ही स्थानो में इस नाट्य के भिन्न भिन्न प्रवेशों से परदा उठ रहा था। 
अबतक छह बच्चों को जन्म देने के अनुभव से दोपहर में ही देवकी जान गई थी की उसके प्रसव का समय समीप आया हैं। उसने वसुदेव को अपनी स्थिती बताई।
बच्चे के जन्म के बाद जो दुर्घटना घटनी थी उसे दोनो ही जानते थे। 
जहाँ देवकी संकट के भय से विचलित हुई थी वही वसुदेव नंद के साथ बनाई गई पूर्वयोजना को कार्यान्वित करने में लग गए। 
उन्होंने देवकी की स्थिति संबधी संदेश गोकुल में नंद को भेजा।

उधर नंद के घर में यशोदा प्रसववेदना से त्याकुल हो रहीं थी। यथासमय यशोदा की प्रसूती हुई। नवजात कन्या को उसकी माँ के पास रखकर उसकी धाय / धात्री अपने घर चली गई। 
जचकी की थकान से यशोदा शुद्धी - बेशुद्धी की सीमारेषा पर थी। परंतु नंद जाग रहे थे। 

मध्यरात्री के समय देवकी ने पुत्र को जन्म दिया। गरजते बादलों की और बिजली की ध्वनि में नन्हे शिशु के रोने की आवाज छुप गई।
देवकी की धाय ने बच्चे को कपडे में लपेटकर वसुदेव को सौंप दिया। एक भरपूर दृष्टी नवजात बालक पर डालकर देवकी की सेविका ने बच्चे को टोकरी में रखने में वसुदेव की सहायता की।
प्रकृति के विकराल रुप के कारण कंस के सैनिक असावधान थे। ना उन्हे बच्चे के रुदन का आभास हुआ ना ही पिछले द्वार से निकल जानेवाले वसुदेव का ! वे निश्चिंतता से सुरक्षित स्थान पर बैठकर उँघ रहे थे।

वसुदेव यमुना पार कर गोकुल पहुँचे। नंद ने सावधानी से द्वार खोलकर उन्हे घर में प्रवेश दिया।

नंद कठोर नहीं थे, परंतु वसुदेव की टोकरी में लेटे नवजात शिशु को देखकर मन मोहित होने की स्थिति उनकी नहीं थी। शिशु को उठाकर यशोदा के पास सुलाते हुए उनके हाथ काँपे होंगे, क्योंकि दूसरे ही क्षण उन्होने अपनी सद्यजात कन्या को वसुदेव की टोकरी में रख दिया।

योजना यहीं थी❗

यशोदा का भी उसी दिन प्रसूत होना मात्र संयोग था (अथवा प्रभु की लीला थी ❗ ), अन्यथा कदाचित नंद को उस बालक की सुरक्षा के लिए उसे कहीं और भेजने का प्रबंध करने की आवश्यकता हो सकती थी।
अब वह चिंता नहीं थी।

परंतु क्या वास्तव में नहीं थी चिंता ? 
अपनी सद्यजात कन्या को नंद साक्षात मृत्यु की भेंट चढा रहें थे ! 

कंस के मन की बात कौन जानता था ?
पुत्र ना होकर कन्या हुई है इसलिए वह इसकी हत्या नहीं करेगा ऐसी आशा ही की जा सकती थी, विश्वास नहीं !
और जचकी में आत्यंतिक थकान से जो यशोदा 'पुत्र या कन्या' यह सुनने से पूर्व शुद्ध ही खो बैठी हो, जिसने अपनी कन्या को ना देखा, ना हृदय से लगाया, उसे दिखाए - बताए बिना अपनी कन्या को ऐसे ही वसुदेव को सौपना...... 

नंद की वेदना हजारो वर्षो तर मूक ही रहीं हैं ! 

परंतु नंद - यशोदा की वेदना से जगत् कल्याण का जो शाश्वत तत्व मानवजाति पर छत्र के रुप में साकार हुआ, उसका गुणगायन हम करते रहेंगे 🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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