#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ६७ - दि. ३०.०७.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ६७ : दि. ३०.०७.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

आज हम श्रीरामचरित्र से जुडी कुछ भ्रांतियाँ और कुछ आक्षेपों से संबधित मुद्दों की चर्चा करेंगे। इस संदर्भ में हम इसपर भी विचार करेंगे की हमारे देवताओं को, हमारे संत व पूजनीय विभूतियों को, हमारी प्रथा परंपराएँ और हमारे त्योहार - पूजाविधि आदि को जब हम श्रद्धाहीन व्यक्ती की दृष्टी से देखते हैं तब मन किस प्रकार भ्रमित होता हैं और ऐसी स्थिति पर क्या उपाय हो सकता है।

श्रीरामजी के राज्याभिषेक के पश्चात एक धोबी द्वारा सीताचरित्र पर आंशंका जताए जानेपर श्रीराम द्वारा गर्भवती पत्नी का त्याग किए जाने के प्रसंग को पुनःपुनः उछाला जाता है और एक शंकालु और अन्यायी पति की छवि श्रीराम पर रोपित की जाती हैं।
इस संदर्भ में रामायण व संस्कृत के अभ्यासकों का कथन स्पष्ट हैं। वह कहते हैं कि मूल वाल्मिकीरामायण श्रीराम के राज्याभिषेक तक ही हैं जिसके अंतिम शब्द हैं कि "इसके पश्चात श्रीराम ने हजारो वर्षों तक राज्य किया"। आख्यान का अंत करने की यह सामान्य पद्धति हैं और इसका अर्थ हैं कि इसके उपरांत कोई अत्यंत महत्वपूर्ण घटना नहीं घटी थी व सर्वसाधारण मानवी जीवन जैसा काल व्यतीत हुआ था।

संस्कृत के अभ्यासक कहते हैं कि इसके पश्चात का भाग अर्थात उत्तरकांड की शैली अबतक के रामायण की शैली से भिन्न है, इसके शब्द - रचना को देखते हुए वाल्मिकीरामायण के लेखक व इस भाग के लेखक भिन्न हैं यह स्पष्ट होता है।
अर्थात उत्तरकाण्ड, जिसमे सीतात्याग का वर्णन है, मूल वाल्मिकीरामायण का भाग ना होकर किसी कवि की कल्पना मात्र है !

रामायण यह श्रद्धा का विषय है, विवाद का नहीं ! 
धर्म में, ईश्वर के अवतारों में श्रद्धा रखनेवाले रामकथा से अवश्य सीख लेंगे, परंतु जिन्होने अपनी बुद्धी और विचारशक्ती को भ्रमित करनेवाले अश्रद्धालुओं को सौंप दिया है, जो अपने देवता व धर्म के प्रतिकों कों दूषित दृष्टी से देखकर पुनःपुनः प्रश्न उछालते रहने को बुद्धीवादिता मानकर गर्व करते हैं, श्रीराम उनका भी कल्याण ही करेंगे, परंतु, रामकथागायन - श्रवण का अनुभव उन्हे रोमांचित नहीं कर पाता है यह वास्तव हैं !

आलोचकों के तो प्रत्येक प्रथा - पद्धति पर आक्षेप ही आक्षेप हैं जैसे -
शिवजी को दुग्धाभिषेक किया तो दूध व्यर्थ बहा रहें हैं....
पर्व में नदियों में स्नान किया तो प्रदुषण बढा रहें हैं....
कुंभमेला तो इनकी आँख का काँटा हैं जिसमें हजारो हिंदु भक्त अपने धर्म की जयजयकार करते हैं....
हिंदुओं ने देवताओं को फूल-पत्री चढाई तो पर्यावरण का नाश कर रहें हैं....
होली मनाई तो पानी का नाश कर रहें हैं और दिवाली मनाई तो हवा प्रदुषित कर रहें हैं....
वे हाथी के मस्तक वाले श्रीगणेशजी का मजाक उड़ाते हैं और हनुमानजी को बंदर कहते हैं....
राम तो उनका प्रिय निशाना है, वैसे शिवजी के रूप पर हँसने की ही उनकी पद्धती हैं और श्रीकृष्ण के लिए इनके दुर्वचनों की सीमा नहीं हैं....

हर व्यक्ती की अपनी स्वतंत्र बुद्धी भी हैं और एक स्वतंत्र जिव्हा भी ❗

भारतीय गणराज्य में  IPC की सीमा का पालन करनेपर प्रत्येक व्यक्ती को अपने अपने मत का प्रदर्शन करने का अधिकार हैं ❗❗

सार्वभौम गणराज्य भारत में नागरिकों के संवाद सरकार द्वारा नहीं लिखे जाते हैं ❗❗❗

परंतु इस स्वतंत्रता के कारण जब हमारे धर्म पर उँगलिया उठाई जाती हैं तब हमारा कर्तव्य हैं कि हम अपने धर्म का ज्ञान उसके मूल तत्वों सहित प्राप्त करें और श्रद्धालु हिंदु का कर्तव्यपालन करें !

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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