#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ५३- दि. १६.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ५३ : दि. १६.०७.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
रामायण में वर्णित व्यक्तिरेखाओं की श्रृंखला में हम आज का विषय एक व्यक्तिरेखापर ही केंद्रित ना करते हुए उनके सगेसंबधी व उनके समाज के संबंध में भी विचार करेंगे। क्योंकि रामायण का अर्थ ग्रहण करने के लिए और रामायण संबधी भ्रांतियों के निराकरण के लिए यह अत्यावश्यक हैं!
श्री हनुमानजी हिंदुओं की श्रद्धा - भक्ती का विषय हैं !
वे अनन्य भक्ती का मापदंड माने जाते हैं !
परंतु भ्रांति यह हैं कि वह वानर थे। अर्थात वानर नामक प्राणी। अर्थात उनकी संपूर्ण प्रजाति को ही वानर (बंदर) माना जाता रहा हैं।
परंतु यह वानर नामक मनुष्यसमूह था, संभवतः तत्कालीन प्रागतिक मनुष्यसमूहों से भिन्न होगा।
विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में रहनेवाले लोगों की कुछ शारिरीक विशेषताएं होती हैं जैसे त्वचा व केश का रंग, आँखों का रंग अथवा आकार, छोटी या दीर्घ - बलिष्ठ कदकाठी इ.।
ठीक उसी प्रकार वानरों की विशिष्ट मुखाकृति के कारण उन्हे प्राणी मान लिया गया होगा। उनकी पूंछ थी यह भी मान्यता हैं। क्या यह सचमुच पूंछ थी अथवा उनके पहनावे के वस्त्र की विशिष्ट पद्धति थी यह ज्ञात नहीं हैं (हनुमानजी ने जब लंकादहन किया था तब उनकी पूंछ में आग लगाने के कारण क्या उन्हे दाह नहीं होता, यदि वह जिवित मनुष्य के संवेदना से पूर्ण शरीर का अंग है? )
इसलिए हमे यह समझना होगा की वानर मनुष्य योनि में से ही थे और अनपढ नहीं थे !
उनकी अपनी समाजपद्धति थी, उनका नगर था (किष्किंधा - आधुनिक कर्नाटक में), यद्यपि उनकी शिक्षाप्रणाली संबधी कदाचित ही कहीं लिखा गया हो परंतु उनमें शिक्षा की व्यवस्था थी ऐसा माना जा सकता हैं क्योंकि रामसेतू के निर्माणशास्त्री नल व नील अच्छे तंत्रज्ञ (Structural Engineer), थे ऐसी मान्यता हैं। अथवा किसी अन्य राज्य के शिक्षा संस्थानों में उन्होने यह विद्या ग्रहण की हो सकती हैं। तब भी यह स्पष्ट होता हैं कि वानर प्रजाति अपनी अगली पिढी की शिक्षा के संब में दक्ष थी अथवा कुछ व्यवस्था अवश्य करती थी !
वाली गदायुद्ध में प्रवीण थे, उनके सुपुत्र अंगद अत्यंत प्रगल्भ व नम्र वृत्ती के, तीक्ष्ण बुद्धी के व न्यायप्रिय थे यह रामायण में वर्णित उनकी व्यक्तिरेखा से स्पष्ट हैं।
उनके पिता वाली को अपने पुत्र के प्रति स्नेह और महत्व था ही, परंतु वाली के अनुज सुग्रीव को भी अंगद से अत्यंत प्रेम था। वालीवध के पश्चात (कदाचित उस समूह की पद्धती के अनुसार) सुग्रीव ने वाली की विधवा तारा से विवाह किया उसके पश्चात भी वे अंगद के प्रति वत्सल ही रहे थे।
इसी समूह के प्रौढ वानर जांबुवंत अत्यंत विचारी व समतोल बुद्धी के थे जो वानर समूह के सदस्यों को आवश्यकतानुसार परामर्श देते थे।
वानर प्राणी (बंदर / monkey) की टोली के सर्वथा विपरित यह वर्णन हैं।
बंदरों की टोली में एक मुखिया होता हैं।
उस भूप्रदेश का सबसे बलिष्ठ नर अन्य नरों को हराकर मुखिया बनता हैं। टोली की सारी मादाएँ उसकी संपत्ति बन जाती हैं व मुखिया के लिए उनक मूल्य उतना ही होता हैं।
टोली में अन्य नर नही होते, केवल मादाएँ व नन्हे बच्चे होते हैं। नया मुखिया बनते ही वह मादा बच्चों को तो हाथ नहीं लगाता परंतु सर्वप्रथम नन्हे नर बच्चों को मार देता हैं क्योंकि वे पुराने मुखिया के बच्चे हैं जो भविष्य में उसके प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं। और बंदर को ऐसी प्रतिस्पर्धा का संकट नहीं चाहिए होता हैं।
बताइये, उपर उल्लिखित सुग्रीव के अधीन वानरों में व वनप्रिय बंदरो की टोली में क्या समानता हैं ?
यह सब देखने का महत्व इसलिए हैं कि हम श्री हनुमानजी के व्यक्तित्व को अच्छी प्रकार समझ सकें व रामकथा में वानरों का कार्य, महत्व व श्रीराम द्वारा वानरों के साथ मित्रता की पहल का भी अर्थ हम ग्रहण कर पाएं ।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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