#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ७० - दि. ०२.०८.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ७० : दि. o२.०८.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

'हरी अनंत, हरीकथा अनंत' इसका साक्षात प्रमाण हैं कृष्णचरित्र जिसका आरंभ भी अभूतपूर्व है!

यद्यपि इतिहास के इस भाग से संबंधित अनेक पृष्ठ काल के कराल मुख में अदृश्य हो गए हैं, परंतु जानकारी के अभाव का परिणाम उलटा ही हुआ हैं!
इस घटना में निहित अनेक संभावनाओं की कल्पना कर एक रोमांचकारी - अद्भुत घटना का साक्षी होने का मोह साधारण से लेकर असाधारण जनों तक सभी के मन में हैं ! 

देवकी की आठवी संतान के हाथों अपने मृत्यु की आकाशवाणी सुनकर कंस क्रोधित हुआ अथवा भयभीत हुआ यह सोचने का विषय है। परंतु उसकी कृति अवश्य हिंसक की थी। वह तलवार उठाकर  देवकी की ओर दौडा। 
वसुदेव ने अपनी नवविवाहिता पत्नी की प्राणरक्षा के लिए कंस से प्रार्थना की और वचन दिया की वह अपनी प्रत्येक संतान जन्म लेते ही कंस को सौंप देंगे।

कंस का भय कम हुआ हो अथवा नहीं परंतु उसने तलवार म्यान कर दी ।

परंतु उसने वसुदेवपर विश्वास किया था यह कहना कठिन हैं क्योंकि उसने दोनों को बंदी बनाने का निर्णय लिया ।

विवाह के दिन ही वरवधू को वधू के भ्राता द्वारा बंदी बनाए जाने की घटना सामान्य नहीं हैं। इस अत्याचार को राजा उग्रसेन भी नहीं रोक पाए इसीसे उनकी विवशता स्पष्ट होती है। सत्ताधीश को पूर्णतः अंकित / असहाय्य बनाकर क्रूर - अत्याचारी - अन्यायी व्यक्ती द्वारा शासन पर पूर्णतः वर्चस्व प्रस्थापित करने की यह घटना थी।

बताया जाता हैं कि कंस ने वसुदेव - देवकी को बंदी बनाकर कडे पहरे में कारागृह में रखा था। परंतु उन दोनों के साथ घटी घटनाओं का विचार करने पर एक और संभावना भी दृग्गोचर होती हैं। 

उनके आठ बच्चे हुए थे। 
क्या यह सामान्य कारागृह में संभव हैं ?
इसलिए संभावना यह हैं कि उन्हे अपने ही घर में अथवा अन्य किसी सुरक्षित घर में बंदी बनाया गया होगा और उनपर कंस के सैनिकों का निरंतर पहरा होगा। 

देवकी राजकुमारी थी और वसुदेव भी नगर के प्रतिष्ठित - धनी नागरिक थे। इसलिए उन्हे सुखसुविधा युक्त निवासस्थान, सेवक आदि उपलब्ध कराएं गए होंगे जिससे वह गृहस्थजीवन प्रारंभ कर सके। 
परंतु यह सेवक - सेविकाएँ भी कंस ने नियुक्त की होंगी।
यद्यपि वसुदेव - देवकी के संपर्क में आनेवाला प्रत्येक व्यक्ति कंस का विश्वसनीय रहा होगा परंतु यह भी हो सकता हैं कि वसुदेव - देवकी के संयमित व्यवहार, मृदु वाणी व सौहार्दपूर्ण व्यवहार ने कंसपक्ष के इन कथित गुप्तचरों का भी मन मोह लिया होगा। 

निरंतर जलवर्षा से कठिन शिला पर भी निशान बनते हैं, यह तो फिर भी मनुष्यप्राणी थे !
संकट की स्थिति में भी इस दंपति द्वारा ईश्वर पर विश्वास रखकर आश्वस्त बने रहने का इन सेवकों पर कुछ परिणाम तो अवश्य हुआ होगा। 
वे कंस के अधीन कार्य करनेपर विवश थे, कदाचित तब भी उनके मन में इस दंपति के प्रति मृदु भावना के अंकुर फूटे होंगे ! 

जहाँ सामान्य जन कृष्णजन्म के लिए अनुकूल स्थितियाँ निर्माण  कर रहे थे, वहीं माया नामक चिरंतन शक्ति कंस से भी इसके लिए कार्य करवा रही थी।

देवकी के आठवें बच्चे से कंस के मृत्यु की भविष्यवाणी जब उसने स्वयं सुनी ही थी, तब, क्या यह उचित नहीं होता की कंस इस संभावना को जड से ही समाप्त कर दें ?

वह वसुदेव - देवकी में से एक की हत्या कर सकता था....
वसुदेव को राज्य से निष्कासित कर सकता था अथवा दोनों को पृथक रख सकता था ताकि देवकी के गर्भधारणा ही ना हो.... 

परंतु उसने ऐसा नहीं किया।
पापी कितना भी शक्तिशाली क्यो ना हो परंतु उसके विनाश के लिए मार्ग वह स्वयं बनाता है इसका यह साक्षात प्रमाण हैं !

दुष्टों के, अत्याचारियों के अंत करने वाले हरी का गुणगान हम करते रहेंगे 🙏🏼।

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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