#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ३४ - दि. २७.०६.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार 
भाग ३४ : दि. २७.०६.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

चंडमुंड के वध के पश्चात शुंभनिशुंभ की मृत्यु का दायित्व चंडिकादेवी को मिला।

देवी के पराक्रम के वर्णन से शुंभ क्रोध से तिलमिलाया व अपने उदायुध, कंबु, कोटिवीर्य, धौम्र, कालक, दौहृद, मौर्य, कालिकेय आदि सेनानियों के साथ हजारो महापराक्रमी राक्षसों की सेना लेकर देवी के साथ युद्ध के लिए चल पडा

इधर विभिन्न देवों की शक्तियाँ स्त्रीरूप लेकर असुरों के साथ युद्ध हेतु सज्जित हुई जिनका वर्णन श्री दुर्गासप्तशती में इस प्रकार हैं -
हंसवाहिनी ब्रह्माणि (ब्रह्मदेव)
बैल पर सवार माहेश्वरी (शिव)
मयूरवाहिनी कौमारी (कार्तिकेय)
वराहरुपिणी वाराही (विष्णु)
नरसिंहरूपिणी नारसिंही (नरसिंह)
ऐरावत पर स्वार इंद्रशक्ती इ. 

देवी ने भगवान शिव के माध्यम से राक्षसराज शुंभ को संदेश भेजा कि सभी असुर देवलोक छोडकर जाए अथवा मृत्यु को आलिंगन देने सज्ज हो जाए! (इसलिए देवी को शिवदूती भी कहा जाता है)।

देवी का संदेश सुन क्रोध से बिलबिलाए असुरों ने भयंकर आक्रमण किया, परंतु विविध देवीरूपों ने उनके अस्त्र तोड डाले व असुरों के महाविनाश का प्रारंभ किया। विकट, भयंकर हास्य करते हुए देवीरूपों ने राक्षसों की सेना को भयचकित कर दिया तथा राक्षसों की मृत्यु के अकल्पनीय अध्याय का आरंभ हुआ। धनुष्यबाण, त्रिशूल, चक्र, वज्र इ. अनेक आयुध व अपने तीक्ष्ण दात व नखों से राक्षसों के प्राण हरण कर विविध देवीरूपों ने राक्षसों की सेना पर महाप्रचंड आक्रमण कर संहार का अभूतपूर्व सत्र प्रारंभ किया।
अधमरे राक्षस मातृगणों के (देवी की सेना) डर से  भागने लगे तब रक्तबीज नामक राक्षस क्रोध से आगबबूला हो गया। उसने देवी के साथ युद्ध आरंभ किया। राक्षस पर शस्त्र चलते ही उसके रक्तकण भूमि पर गिरते थे। उसके रक्त के प्रत्येक कण से नया राक्षस निर्माण होकर देवी की सेनापर बरसने लगा। रक्त के प्रत्येक कण से नया राक्षस जब जन्म लेने लगा तब उनकी संख्या पर क्या ही नियंत्रण रह पाता ! 
वे तो विश्व को व्यापने लगे !
मात्र संख्या के आधार पर विश्व को आतंकित करनेवाले राक्षसों को देखकर देवता भी उदास हो गए, इस संकट का तोड कौन करें और कैसे यह गंभीर चिंता का विषय था।
परंतु चंडिकादेवी ने काली को आदेश दिया कि वह अपना विकराल मुख खोल कर उस राक्षस के प्रत्येक रक्तकण को भूमिपर गिरने से रोके जिससे असुरों की भयावह संख्या अपनेआप घटने लगे। 
महाकाली ने तत्काल स्वयं तथा चामुंडादेवी के रुप में राक्षस का रक्तप्राशन प्रारंभ किया। राक्षसों की संख्या पर नियंत्रण मिलते ही कौशिकीदेवी ने शस्त्रों से रक्तबीज राक्षस को मार गिराया !

यह था आज का कथाभाग।
इसके विश्लेषण की आवश्यकता कदाचित हैं ही नहीं किंतु एक बात पर अवश्य ध्यान दें कि समाज को हतबल कर संख्या के आधार पर समाज के लिए संकट उत्पन्न करनेवाले असामाजिक / आतंकी तत्व जब समाज में, राष्ट्र में बढ जाते हैं, समस्त शस्त्रों से परिपूर्ण होकर लडनेपर भी जब रक्तबीज राक्षस समाज व राष्ट्र को आतंक के घेरे में बांधता हैं तब राक्षस का सत्य स्वरूप जानकर उसके दमन के लिए शस्त्र उठाना यहीं मातृशक्ति का परम कर्तव्य हैं !
 
शुंभ राक्षस की पत्नी बनकर त्रैलोक्य पर सत्ता चलाना देवी को मान्य नहीं था, उसने राक्षसों को तो मार गिराया ही, तथा रक्तबीज राक्षस से नए राक्षस उत्पन्न होने होने की क्रिया का मर्म समझकर राक्षसों की उत्पत्ति के  मूल पर ही कुठाराघात कर दिया व  विश्व को भविष्य के आतंक से मुक्ती दी❗

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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