#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ७८ - दि. १०.०८.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ७८ : दि. १०.०८.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
यमुना नदी पार करने के सुरक्षित स्थान से वसुदेव गोकुल गाँव पहुँचे।
हमने यह पढा है, सुना हैं कि नंद की पत्नी यशोदा उसी रात प्रसूत हुई थी और उनके कन्या हुई थी।
वसुदेव घर में गए, उन्होने यशोदा के पास अपने नन्हे शिशु को लिटाया और उसकी नवजात कन्या को लेकर वह पुनः मथुरा के लिए चल पडे।
क्या इसमें और संभावनाएँ नहीं हो सकती हैं ?
वसुदेव - देवकी के पुत्र द्वारा कंस के वध की भविष्यवाणी के संबंध में नंद भी तो जानते होंगे....
उसके पश्चात कंस द्वारा दोनो को बंदी बनाए जाने संबंधी सूचना वसुदेव के इस मित्र को अवश्य होगी....
और कंस द्वारा उनके बच्चों की भीषण हत्या के संबध में तो सभी प्रजाजन जानते थे !
वसुदेव - देवकी की इस विलक्षण परीक्षा के कारण सामान्य जनों के मन में सहानुभूति होगी ही, परंतु वसुदेव से मित्रत्व कारण नंद का मन अधिक अस्वस्थ रहा होगा, किसी भी प्रकार अपने मित्र की सहायता करने के लिए वह छटपटा रहे होंगे।
संभावना यह भी हैं कि कंस का क्रोध व उसके संभाव्य दुष्परिणाम इ. का विचार ना करते हुए वह नियमित रूप से वसुदेव से मिलने मथुरा जाते होंगे।
वसुदेव - देवकी हो अथवा नंद - यशोदा, इन चारो व्यक्तियों का उल्लेख केवल कृष्ण के जन्मदाता व पालनकर्ताओं के रुप में ही पाया जाता हैं।
इनमें से किसी का भी जैसे स्वतंत्र अस्तित्व था ही नहीं !
कृष्ण का संदर्भ छोडकर इनके किसी भी कार्य की चर्चा नहीं होती हैं।
ऐसे लोगों को 'सामान्य' मानने की प्रथा हैं।
परंतु इन चार व्यक्तियों के लिए हम 'सामान्य' इस विशेषण का उपयोग नहीं कर सकते हैं। साक्षात विष्णु ने जिनका जन्मदाता और पालनकर्ता मातापिता के रुप में चयन किया वह 'सामान्य' कैसे हो सकते हैं !
पुण्यवान तो वह थे हीं, साथ ही उनमें कुछ विशेष गुण अवश्य रहे होंगे !
ऐसे गुण जो कृष्ण जन्म और कृष्ण पालन के लिए अत्यावश्यक थे !
और उनके इन्हीं गुणों के कारण कृष्णजन्म की परिस्थितियाँ रहस्यमयी और रोमांचक होने के उपरांत भी अंततः उन्हे अपने कार्य में यश की प्राप्ती हो पाई थी !
हम इनपर और विचार कर समझने का यत्न करेंगे..
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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