#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग २३ - दि. १६.०६.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग २३ : दि. १६ .०६.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
शिवजी विवाहित है।
यह विवाह मनुष्यों के समान विवाहसंबध नहीं है !
शिवजी और आदिमाया (प्रथम सती, तदनंतर पार्वती के रुप में) का यह युगल विश्व कल्याण के लिए सामर्थ्य और (स्त्री)शक्ति की एकरूपता का प्रतीक है।
क्यों है ऐसा की जगतकल्याण के लिए पुरुष के साथ प्रकृति का अस्तित्व और सहयोग भी अत्यावश्यक माना गया हैं ?
क्यो ?
क्योंकि हिंदु संस्कृती में स्त्री के विशिष्ट (unique) गुणों का योगदान मानव संस्कृती के विकास के लिए, विचारधारा में संतुलन के लिए और समाज की उन्नति के लिए अति आवश्यक माना जाता हैं !
यदि ऐसा हैं तो शिवजी द्वारा तीसरी आँख खोलकर कामदेव को भस्म करने का क्या अर्थ हैं?
जो संस्कृती स्त्री का सम्मान करती है, उसे आवश्यक मानती हैं उसे स्त्री के आकर्षण से इतना विरोध, इतनी वितृष्णा क्यो है ?
👆🏼 वास्तव में यह ना तो विरोध हैं ना वितृष्णा ! शिवजी द्वारा कामदेव के दहन को एक पृथक परिप्रेक्ष्य (perspective) से देखना होगा।
कामदेव ने शिवजी को वशीभूत कर उनके मन में स्त्री का आकर्षण और कामना (desire) उत्पन्न करने का प्रयत्न किया था जब शिवजी तपस्या कर रहे थे। कामदेव द्वारा तपस्या के समय इस प्रकार विघ्न उत्पन्न करने के कारण क्रोधित होकर शिवजी ने कामदेव को अग्निसात कर दिया।
क्योंकि हिंदु धर्म में स्त्री को भोग्या (used for satisfying own desires) नहीं माना जाता हैं!
हिंदु संस्कृती प्रजोत्पादन को धर्म मानती हैं और धर्म के निर्वाहन के लिए विवाह भी धर्मकार्य ही हैं। और इसके लिये समय निहित है। तपस्या के समय - पूजा - अध्ययन आदि के समय पतिपत्नी का परस्परों के लिए आकर्षण निषिद्ध है ! क्योंकि वह आपकी पत्नी है इसलिए समय असमय पत्नी को कामभावना से देखकर धर्मच्युत होने की मान्यता हिंदु धर्म नहीं देता है।
इसी कारण तपस्या में इस प्रकार का (पतन के मार्ग पर खींच सकनेवाला) विघ्न डालने के अपराध में कामदेव को अग्नि से नष्ट किया गया ।
आज के आख्यान को पूर्णविराम देते हैं।
वैसे हिंदु संस्कृती में स्त्री के स्थान पर चर्चा (उदाहरणों समेत ❗) क्रमशः आगे बढेगी।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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