#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ५७ - दि. २०.०७.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ५७ : दि. २०.०७.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

रामायण के कुछ पात्र ऐसे हैं जिनके लिए हमारे मन में आदरभावना अवश्य हैं, परंतु हम उनके विषय में अधिक सोचते नहीं हैं। रामायण के संदर्भ में केवल दो चार वाक्यों में उनका वर्णन किया जाता हैं।

ऐसे कुछ पात्रों पर हम संक्षेप में विचार करेंगे।

शबरी
जूठे बेर श्रीरामजी को खिलाने के पश्चात भी श्रीराम द्वारा अति सम्मानित भक्त का आदर पानेवाली शबरी की व्यक्तिरेखा सब जानते हैं।

शबरी संभवतः एक भील की पुत्री थी। उसके विवाह के भोजन लिए पिता बहुत से बकरे - बकरियाँ ले आए। उस वनवासी समाज की यहीं पद्धति रही होगी। यद्यपि शबरी इसी समाज में पली थी, परंतु इतनी भयंकर हिंसा के विचार को वह सह नहीं पाई और गृहत्याग कर वह वन में चली गई।

अकेली युवती, वन में कहाँ रहती ! वह भी राक्षसों का आतंक भरे उस काल में ! उसने वन में ऋषियो के आश्रम में आश्रय पाने का प्रयत्न किया होगा। ऋषि मतंग ने उसे शरण दी। 

शबरी आश्रम में संभवतः सेविका के रुप में ही रही होगी परंतु ऋषिकुल के पवित्र वातावरण के प्रभाव से उसका मूलतः निर्मल - कोमल मन भगवद्भक्ति को ओर मुखर हुआ होगा यह भी संभावना है।

वृद्धावस्था में और कदाचित ऋषि मतंग के देहावसान के पश्चात शबरी ने पंपा सरोवर के निकट एक कुटी को अपना निवासस्थान बनाया होगा।

इसके पश्चात का इतिहास हम जानते हैं। श्रीराम - लक्ष्मण के अतिथ्य के लिए शबरी ने वन से बेर लाए और प्रभु को केवल मीठे बेर अपर्ण करने के लिए प्रत्येक फल प्रथम स्वयं चखकर ही प्रभु को अर्पण किया। श्रीरामजी ने भी इसे जूठा व त्याज्य ना मानते हुए सद्भक्त की अर्चना के रुप में स्वीकार किया।

शबरी की व्यक्तिरेखा से एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित होता हैं। वह भील समाज से थी। उस युग में यह समाज नागर जीवन से दूर था। अर्थात पुरुष व स्त्रिया, किसी के भी लिए प्रचलित शिक्षा पद्धती से शिक्षा पाने की संभावना नहीं थी। इसलिए शबरी के व्यक्तित्व के त्याग, निष्ठा, भक्ती, समर्पणभावना, तपस्या व वैराग्य की लगन यह सभी भाव स्वयंभू थे।

शबरी के भिलनी होने तथ्य को देखते हुए यह भी संभव है कि उन्हे सहज ही किसी आश्रम में शरण नहीं भी मिली होगी। मतंग ऋषि द्वारा आश्रय देने से पूर्व उन्होने कदाचित नकार अथवा अवहेलना भी सहन की होगी। प्रमाणों के अभाव में निश्चित निष्कर्ष संभव तो नहीं हैं परंतु इसकी कल्पना तो की जा सकती हैं कि एक युवती - जिसने स्वाभाविक रूप से विवाह के स्वप्न देखे होंगे - उसके लिए अपने समाज से, मातापिता, बंधु-बांधव, सगेसंबधीयों से कटकर भीलों की जीवनशैली से पृथक आश्रम की परंपरा में स्वयं को ढालना सरल तो नहीं ही रहा होगा।

सर्वसाधारण विवाहित भीलनी के जीवन के लिए तत्पर शबरी का औचक मार्ग बदलना व वैसी कोई पार्श्वभूमि ना होने पर भी प्रभु के सर्वोच्च भक्तों मे स्थान पाना इस उदाहरण से हम सुविधायुक्त जीवन जीनेवालों को सीख लेनी चाहिए 🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१३

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४८

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०२