#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ५४- दि. १७.०७.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ५४ : दि. १७.०७.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

हमने वानर नामक मनुष्य समूह पर कुछ विचार किया था।
अनुमानतः यह मानवसमूह उस काल के अन्य मानव समाज समान प्रगत नहीं था। 

कदाचित उनमें से शिक्षित वानरों ने अपने राज्य के बाहर कहीं से शिक्षा ग्रहण की हो यह भी संभव हैं। 
धनुर्विद्या - खड्गविद्या मे कुशल वानरों का उल्लेख सहसा नहीं पाया जाता हैं। वे मल्लविद्या (कुश्ती) व गदायुद्ध में प्रवीण थे, इसका अर्थ हैं कि यह शरीर से बलिष्ठ प्रजाति रहीं होगी, परंतु धनुष्य - बाण - तलवार आदि शस्त्र बनाने का कौशल कदाचित उनके पास नहीं था।

हनुमान इन्हीं में से थे।
परमआदरणीय, शक्तिशाली हनुमानजी का नाम भक्तों की उच्च से उच्चतर श्रेणी में लिया जाता हैं !

रामायण काल के विषय में आधुनिक इतिहास जैसे प्रमाण प्रचुर मात्रा में नहीं हैं इसलिए हमें उस काल की व्यक्तिरेखाओं को भी मन की आँखों से देखना - समझना होगा ।

हनुमानजी को हम बंदरों की प्रजाति में रखते आए हैं। साधारण कल्पना यही है की वे शक्तिशाली थे व श्रीरामजी के प्रेमभरे व्यवहार ने उन्हे राम का अनन्य भक्त बना दिया।

यह सब तो वे थे ही, परंतु उससे भी अधिक बहुत कुछ थे। उनके स्वरूप की कुछ कल्पना हम अपने मन से कर सकते है और उससे भी अधिक शाश्वत तथ्य हमे श्री समर्थ रामदासस्वामीजी की रचना 'मारुतिस्तोत्र' से ज्ञात हो सकते हैं। 

इस स्तोत्र में हनुमानजी का अति सुंदर वर्णन किया गया हैं। स्वामी कहते हैं के वह 'धूर्त वैष्णव गायक' हैं।
यहाँ धूर्त इस विशेषण का उपयोग सकारात्मक रूप से किया गया हैं। अपने बुद्धीचातुर्य से शत्रुनिती व उसके दाँवपेच समझ कर जो पहले ही योजना बना लेता हैं ऐसे धूर्त थे हनुमानजी ! साथ ही वे वैष्णव गायक थे अर्थात विष्णुरूप (राम) की स्तुति का गायन करते थे। कहना ना होगा की विष्णुरूप के स्तुतिपर वचन कहनेवाले इस व्यक्ति का मन छल कपट से परे था (वे देवों से अस्त्र -शस्त्र -वरदान माँग कर अपनी पापेच्छा पूर्ण करनेवाले असुर नहीं थे यह समझना भी आवश्यक हैं)। अर्थात वे अपनी धूर्तता का उपयोग दुष्ट शत्रुओं के दमन के लिए करेंगे, स्वार्थ के लिए नहीं!

वे मन में जनकल्याण की पवित्र भावना अवश्य रखते थे परंतु दुष्टों को बलप्रयोग का भय भी दिखाते थे क्योंकि उन्हे दंड की भाषा ही नियंत्रण में रख सकती हैं!
स्वामीजी ने युद्ध में प्रचंड होनेवाले हनुमानजी का रोमांचित करनेवाला वर्णन किया हैं।
वह कहते हैं "ध्वज उठानेवाली अर्थात दायी बांह को उठाकर वह आवेश से आगे बढते हैं। वे  क्रोध से अपने दांतो को भींच लेते हैं। अत्याचारी शत्रु को देखने ही उनकी भौंहे तन जाती हैं और उनके नेत्रों से जैसे आग उगलती हैं। उनका रुप देखकर भयभीत करनेवाला हैं!"
क्या सचमुच ?
हाँ ! 
परंतु यह रुप दुष्ट शत्रुओं के लिए हैं, प्रभु भक्तों के लिए उनका रुप रणभूमी में भी मन मोहन हैं !
उन्होने सुंदर कटिवस्त्र पहना हैं..
उसमें मधुर नाद करनेवाली घंटियों की मेखला बांधी हैं ..
वह पर्वत समान विशालकाय हैं, परंतु यह दीर्घाकार भी सुंदर हैं क्योंकि उनका शरीर प्रमाणबद्ध हैं..
भव्य शरीराकृती के साथ भी वह अति चपल हैं..वह विद्युल्लता के वेग से रणविहार करते हैं .. वह विद्युत्शक्ति जो गहन अंधकार को दूर कर मन को भक्ती से प्रकाशित करती हैं किंतु उसी समय शत्रुओं को भयचकित कर देती हैं..

हनुमानजी का यह वर्णन पांडवों के राजसूय यज्ञ के समय भगवान कृष्ण द्वारा दिखाए गए  विराट रुप का स्मरण कराता हैं क्योंकि दुर्योधन व उनके मित्र प्रभु के उस विराट रुप का तेज सह नहीं पाए और भयभीत हो गए थे। परंतु पांडव, भीष्म,  विदुर आदियों ने प्रभु के उस रुप को दुष्ट निर्दालक महाशक्ती के रूप में वंदनीय ही माना था, उन्हे भय की भावना ने स्पर्श नहीं किया था क्योंकि उनके मन में पाप नहीं था !

हनुमानजी की शक्ति व बुद्धी का प्रमाण हैं उनके लंकागमन का प्रसंग। मान्यता हैं कि जांबुवंत  द्वारा उनकी शक्तियों का स्मरण करानेपर उन्होने आकाश में उडान किया व वे आकाशमार्ग से लंका पहुंचे !
तर्कबुद्धी कुछ और पर्याय भी बताती हैं। कदाचित वे समुद्र से तैरकर गए हो !
हमने वर्ष १९२० में हमारी पहली श्रीलंका भेंट के समय वहाँ के स्थानिक मार्गदर्शक (Guide) श्री स्वामी से सुना था कि उनके परदादा - दादी तमिलनाडू से तैरकर लंका आए थे व उपजिविका के लिए वहीं बस गए। तमिलनाडू के विशिष्ट स्थान व श्रीलंका का अंतर अच्छे तैराक के लिए साध्य हैं। 

ऐसे में हनुमानजी द्वारा तैरकर लंका पँहुंचने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता हैं ! और वह तो फिर बलिष्ठ भी थे, अच्छे तैराक के लिए आवश्यक बल उनमें होना संभव हैं !

हनुमानजी के चरित्र के पैलुओं पर हम आगे भी विचार करेंगे ।

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
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