#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ३१- दि. २४.०६.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ३१ : दि. २४.०६.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
हिंदु धर्म में अभिप्रेत स्त्री की भूमिका पर हम विचार करेंगे। इसके अनुरूप आचरण करनेपर हुए समाजकल्याण के उदाहरणों को देखेंगे।
हम देवीआख्यान के विविध अध्याय में देखेंगे की उन्मत्त, दुष्ट, क्रूर, अतिशक्तीशाली, महाभयंकर राक्षसों के अत्याचार से त्रस्त देवता देवी की शरण में आते हैं तथा माता से राक्षस संहार की प्रार्थना करते हैं !
अन्य धर्मी हिंदु धर्म की जो बातें साधारणतः विचित्र मानते हैं, उसमे यह एक बात है👆🏼। देवता को भय कैसा ?
उन्हे तो शाक्तिशाली - निर्भय होना चाहिए ?
यह कैसे देव हुए जो रोते - गिडगिडाते दूसरे देव को मदद की गुहार लगाते हैं ?
अन्य धर्मों में एक ही परम शक्ति (देव / प्रेषित ) को माना जाता हैं। किंतु हिंदु धर्म में स्थिति भिन्न हैं जिनके विषय में हमने भाग २१ (दि. १४.०६. २०२३) को चर्चा की थी।
👆🏼 इसके अनुसार राक्षसों के निर्दालन का कार्य इस समय देवी को सौंपना निश्चित हुआ था।
अब राक्षस होते ही क्यों हैं यह ना पूछे क्योंकि वह सर्व धर्मों में वर्णित हैं.. नाम भिन्न है जैसे सैतान, Demon, Evil Power आदि, परंतु उनके अस्तित्व को सब मानते हैं। तब उनका निःपात भी करना पडता है!
भिन्न आसुरी शक्तियों का निर्दालन देवता के भिन्न रूपों ने समय समय पर किया हैं। इस समय देवी माँ को यह कार्य सौंपा गया था।
किसी भी विचारी व्यक्ति के लिए इसका कारण स्वयंस्पष्ट हैं। स्त्रीरूप की प्रतिष्ठा स्थापित करना!
आदरणीय/अनुकरणीय/महनीय आदर्श ही मानव के व्यवहार को प्रभावित करते हैं, इसलिए स्त्रीरूप को महापराक्रमी/ असुर संहार की क्षमता रखनेवाली महाशक्ती के रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक था जिससे मानव भी स्त्री को पूजनीय/ संकटहारिणी/ तेजोमय देवता के रूप में देखें!
हम मानव धर्म का अर्थ समझने में (interpretation) में भूल कर रहें हैं परंतु जैसा की देवीआख्यान से स्पष्ट हैं, हिंदु धर्म में स्त्री में ऐसा सामर्थ्य वर्णन किया गया हैं कि ईश्वर के पुरुष रुप ने संकट हरण के लिए स्त्री रुप की शरण ली हैं!
देवीमाँ का अभिमानास्पद आख्यान क्रमश: आगे बढेगा....
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें