#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ५२- दि. १५.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ५२ : दि. १५.०७.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
आज से हम रामायण की कुछ व्यक्तिरेखाओं के विषय में चर्चा करेंगे। इन व्यक्तियों के विषय में साधारण जनमत व उनकी वास्तविकता पर विचारविमर्श करेंगे।
कदाचित यह मान्य करना सभी के लिए संभव ना भी हो सकता हैं। किंतु इस विषय का उद्देश हम सबको पुनर्विचार व समिक्षा के लिए प्रेरित करना हैं।
प्रारंभ हम कर रहें हैं माता कैकयी से।
कैकयी केकय राज्य के राजा अश्वपति की कन्या थी जो आधुनिक काल के पाकिस्तान में बियास (तत्कालीन विपाशा नदी) नदी के आसपास का भाग हैं।
केकय राजकुमारी होने के नाते वह कैकयी कहलायी जैसे गांधार की राजकुमारी गांधारी थी।
कैकयी सुंदरी व बुद्धीमान थी। क्षत्रिय राजकन्या थी, इस कारण उन्होने शस्त्रदिक्षा भी ग्रहण की थी। वे सारथ्यकला में निपुण थी।
राजा दशरथ के अंतःपुर में अनेक रानियाँ थी। यह आंकडा ३५० तक बताया जाता हैं यद्यपि इसका प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। किंतु स्पष्ट हैं की बहुपत्नीत्व की व्याख्या उनके द्वारा असाधारण रुप से खींची गई थी। यह उस काल की प्रथा रहीं हो वा राजनैतिक बाध्यता, परंतु हिंदु संस्कृती में - कुछ अपवादों को छोडकर - अब बहुपत्नीत्व / बहुपतित्व को मान्यता नहीं हैं। क्योंकि हिंदु संकृती गतिहीन (static) नहीं हैं। कालानुरूप परिवर्तन करने की परंपरा के अनुकुल एकपत्नीव्रत व (कुछ अपवाद छोडकर) एकपतिव्रत ही अब हिंदुओं की सभ्यता हैं। इतिहास की अब अनावश्यक बन गई परंपराओं की आड में उपभोग की विकृत इच्छाओं का उदात्तीकरण हिंदु धर्म नहीं करता हैं !
राजा दशरथ सूर्यकुल (अथवा रघुकुल, ईक्ष्वाकु वंश) के राजा अज व पत्नी विदर्भ राजकन्या इंदुमती के पुत्र थे।
वे धर्मपरायण, प्रजावत्सल, न्यायी थे व असाधारण युद्धकुशल वीर थे। बताया जाता है की उनका मूल नाम नेमी था, उन्हे दशरथ इसलिए कहा गया क्योंकि उनका रथ दसो दिशाओं में गमन कर सकता था। वे एक ही समय में दस रथों में आरूढ होने समान गतिमान रथ से भी कुशलता से युद्ध कर सकते थे।
शंबरासुर के साथ युद्ध में देवराज इंद्र ने राजा दशरथ से सहायता की प्रार्थना की थी। दशरथ तत्काल मान गए। उनकी प्रिय रानी कैकयी भी आग्रह कर इस युद्ध में पति के साथ गई। उनके सारथि की मृत्यु होनेपर वे दशरथ की सारथि बन गई। युद्ध के बीच राजा के रथ चक्र की धुरी टूट गई। कैकयी ने तत्काल अपने हाथ का धुरी समान उपयोग किया। भयंकर वेदना सहकर उन्होने रथ को गिरने से बचाया। युद्ध समाप्ती के पश्चात ही दशरथ ने कैकयी के विलक्षण पराक्रम को जाना। उन्होने कैकयी से आग्रह किया की उनके प्राण बचाने के लिए वह दो वर माँग ले।
कैकयी ने यह बात नहीं मानी। उनका मानना था की युद्धक्षेत्र में वीर की रक्षा करना उसके सारथि अथवा सहायक का धर्म होता है, और वह तो दशरथ की पत्नी थी जिसका धर्म स्वयं को दाँव पर लगाकर भी पतिरक्षा करना हैं। उन्होने दशरथ के दोनो वरों को लेने को नम्रतापूर्वक नकार दिया। परंतु महाभयंकर असुर के साथ युद्ध में कैकयी की बुद्धीमत्ता व सावधानी के अति प्रसन्न होकर राजा उन्हे पुनः पुनः आग्रह करते रहें।
हारकर कैकयी ने कह दिया की वे भविष्य में आवश्यकतानुसार उनसे वर माँग लेगी।
अनेक वर्षों के अंतराल के पश्चात अब पुनः इन वरों की बात उठती हैं। किंतु इस सारे काल में कैकयी का वर्तन कैसा था ?
वे स्निग्ध दृष्टीवाली ममतामयी माँ थी !
माता भरत की थी किंतु सर्वाधिक प्रेम श्रीराम से करती थी। श्रीराम के प्रति कैकयी के वात्सल्य का, प्रेमभावना का , उनकी कोमल भावनाओं का वर्णन महाकवि ही कर सकते हैं, साधारण मनुष्य के लिए यह संभव ही नहीं हैं !
राम के युवराज्याभिषेक की वार्ता से कैकयी अति प्रसन्न हुई। इस समय भरत अपने ननिहाल केकय देश गए हुए थे। राजा ने ना तो भरत को बुलाया ना केकय के अपने संबंधियों को ! उन्हे भय था .. कैकयी से विवाह समय राजा पुत्रहीन थे, इस कारण अश्वपति ने कन्या विवाह के लिए उसके पुत्र को भविष्य में राजा बनाने की शर्त रखी तो दशरथ मान गए।
परंतु अब ज्येष्ठ पुत्र राम थे, युवराजपद यह उनका अधिकार था। कैकयी को अपने विवाह की शर्त का पूर्णतः विस्मरण हो गया था परंतु दशरथ को नहीं ! इसलिए उन्होने भरत व कैकयनरेश की अनुपस्थिति में यह आयोजन किया।
कैकयी के आनंद - उत्साह का अंत नहीं था। उनके प्रिय पुत्र राम के युवराज्याभिषेक की वार्ता उन्होंने अमृतसमान ग्रहण किया।
आगे का इतिहास सर्वविदित है। मंथरादासी (जो कैकयी की धाय व संभवतः दूध माता थी) के कथन पर दो वरों के रुप में कैकयी ने भरत के लिए कोसल देश का राज्य व श्रीराम के लिए वनवास मांग लिया।
कैकयी इस कृती के लिए युद्ध में हुतात्मा समान सम्मान की अधिकारिणी हैं !
ना वे यह करती ..
ना राम वनवास के लिए जाते ..
ना वे वनवासियों के साथ नाता जोड पाते ..
ना वे देश को एक सूत्र में बांधने के कार्य का आरंभ कर पाते ..
ना सीताहरण होता ..
ना पत्नीहरण का निमित्त बनाकर वे राक्षसों के सर्वोच्च शाक्तिस्थल का नाश करते ..
ना इतने विशाल देश को राक्षसों के आतंक से इतना संरक्षण मिलता ..
श्रीराम का जयजयकार हुआ ..
सीता पतिव्रता के रुप में पूजनीय बनी ..
लक्ष्मण व भरत भ्रातृप्रेम के लिए आदर्श कहलाए..
राजा दशरथ - माता कौशल्या व सुमित्रा करुणा का विषय बने ..
परंतु कैकयी को क्या मिला ?
कैकयी यह नाम दुर्वृत्ती, मत्सर, कठोरता, द्वेष का पर्याय बन गया!
उन्हे कलंकिनी माना गया..
वह पापिनी कहलाई ..
उन्होने वैधव्य झेलना पडा ..
अपने ही पुत्र द्वारा निर्भत्सना का पात्र बनी ..
क्यों हुआ यह सब ?
कदाचित भगवान राम की प्रेरणा से बुद्धी की देवता गणेशजी व माता सरस्वती ने कैकयी से दुर्वचन कहलाएं !
कैकयी ही क्यों ?
क्योंकि जो श्रेष्ठ हैं, ईश्वर उन्ही को दुख सहने का भार देते हैं ! और राम को माता कैकयी के प्रेम पर यह विश्वास था की राम द्वारा जगतकल्याण के लिए कैकयी सदा के लिए दुष्किर्ति भी मान्य कर लेगी !
अति प्रेम ही ऐसी कठोर परिक्षा को पार कर सकता हैं और राम कैकयी के उनके प्रति अत्याधिक प्रेम को लेकर निश्चिंत थे, इसलिए प्रभु ने माता कैकयी की अनुमति के बिना उनका सर्वोच्च बलिदान कर दिया !
प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम की यह अद्भुत गाथा हैं .. माता कैकयी को नमन !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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