#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ४८- दि. ११.०७.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ४८ : दि. ११.०७.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

वनवास का काल प्रभु के लिए राजकर्तव्यों से मुक्त शांतिपूर्ण - स्वस्थ जीवन नहीं था, क्योंकि रामायण यह प्रभु द्वारा विविध उपायों से किए गए जनकल्याण की मननीय गाथा है!

हम इसे क्रमशः देखेंगे, यद्यपि इसमें हर शब्द का, हर वाक्य का प्रमाण देना संभव नहीं है। यह हमे अपने विचारों से , तर्कबुद्धी से समझना होगा।

रामलक्ष्मण जब किशोरवयीन थे तब उन्हे ब्रह्मर्षि विश्वामित्र राक्षस निर्दालन के लिए साथ ले गए थे। ऋषि स्वयं क्षात्रधर्म त्याग चुके थे इसलिए उनके लिए शस्त्र उठाना निषिद्ध था। परंतु अयोध्या के अल्प आयु के राजकुमारों ने ताडका राक्षसी का वध किया, सुबाहू राक्षस को भस्म किया व मारीच को वन से दूर भगाया।

प्रश्न यह हैं कि अन्य सभी राजकुलों के होते हुए सहायता के लिए ऋषि ने इन दो किशोरवयीन राजकुमारो को हीं क्यों चुना ?
क्योंकी रामायण नामक पट में श्रीराम द्वारा अयोध्या के राजमहल से राज करना निहित नही था! 
इन राजकुमारों को भावी वनवास के लिए व वनवासकाल में भी किए जा सकनेवाले राजकर्तव्यों के लिए तयार करने की भूमिका वनभ्रमण के काल में ऋषि विश्वामित्र ने बांधी होगी।
परिणामस्वरूप, चौदह वर्षों के दीर्घ वनवासकाल में श्रीरामजी उत्सुक छात्र समान ज्ञानग्रहण करते रहें, ज्ञानमार्गी समान आध्यात्मिक चर्चा करते रहें, कर्तव्यदक्ष राजकुमार समान जनकल्याण के लिए ऋ्षिमुनियों से मार्गदर्शन लेते रहें और समस्त ज्ञानेद्रियों सें सामान्य वनवासीयों की समस्याओं का अनुभव कर मन ही मन उपायों पर विचार करते रहे।

अर्थात वनवास के इस काल में श्रीराम ने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र द्वारा दिए गए पाठ का प्रत्यक्ष उपयोग किया। 
श्रीराम के वनवास मार्ग में जहाँ भी उन्होने विश्राम किया वहाँ अपने आत्मिय व्यवहार से उन्होने  स्थानिक जनजातियों, वनवासी जन व आश्रमवासियों का मन मोह लिया। उन सभीने अपने जीवनसंघर्ष के संबंध में, अपनी समस्याएँ व कठिनाइयों के विषय में श्रीरामजी से चर्चा की। श्रीराम ने जितना सुना होगा उससे भी अधिक देखा होगा! 

बंधु भरत द्वारा राजा बनने को स्पष्ट रुप से नकारने के कारण वे ही अयोध्या के भावी सम्राट थे ! तो भावी सम्राट ने जनसामान्यों के जीवन के आव्हानों को उनके ही मध्य रहकर समझा ! कहना ना होगा की सत्ताधीशों द्वारा ऐसी पहल वंचित / पिछडे वर्गों के कल्याण के लिए कितनी लाभदायी होती हैं!

सारांश, प्रभु श्रीराम यह संपन्न राजकुल में जन्म लेकर, साधन-सुविधायुक्त जीवन जीने का उदाहरण नहीं हैं ! 
यह विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग द्वारा अपने अधिकार का उपयोग कर सुरक्षित - सुखद जीवन जीने की खोखली (hollow) गाथा नहीं हैं!
यह साक्षात ज्ञानमूर्ति के करुणामय व्यवहार का अनुकरणीय वर्णन हैं !

दिव्य रामकथा से जुडे ऐसे ही तथ्यों के माध्यम से हम हिंदु धर्म की विचारधारा भी समझने का प्रयत्न करते रहेंगे....

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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