#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ५६ - दि. १९.०७.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ५६ : दि. १९.०७.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

श्रीराम का इतिहास समकालीन लेखक / इतिहासकारों ने नहीं लिखा हैं। इन घटनाओं के अनेक शतकों के पश्चात यह लिखा गया हैं। वह भी इतिहास लेखन की पद्धति से नहीं लिखा गया, काव्य - कहानी रुप में लिखा गया है। 
इस कारण अनेक मुद्दों पर स्पष्टता नहीं हैं..
अनेक घटनाओं में विसंगति का आभास हो सकता हैं.. 
अनेक प्रश्न व भ्रांतियाँ हो सकती हैं.. 
रामायण में वर्णित व्यक्तिरेखाओं को समझने में कदाचित कठिनाई अथवा भूल भी हो सकती है..

परंतु अत्यंत प्राचीन सभ्यताओं संबधी ऐसी समस्याएँ होती ही हैं ! हडप्पा - मोहेंजोदारो , इजिप्त के पिरॅमिड, चीन के टेराकोटा वॉरियर, दक्षिण अमरीका में पर्वतों पर बैठी स्थिती पाई गईमें अनेक ममी, समुद्रतल में समाएँ द्वारका जैसे नगर इतिहास का लिखित विस्तृत वर्णन ना होने के कारण पहेली ही बने हुए हैं !
इनके विषय में तर्क किया जा सकता हैं। किंतु यह भी संभव हैं कि कुछ ठोस प्रमाण मिलनेपर हमारे विचारों की दिशा बदलनी होगी।

परंतु त्रेतायुग के उस काल को समझने का प्रयत्न वर्तमान समय में हम तर्क से ही कर सकते हैं।

हनुमानजी के विषय में हमने अबतक जो विचार किया था उसी क्रम को आगे बढाते हुए हम सीधे उनके द्वारा लंका पहुंचने के प्रसंग तक आते हैं। 

मान्यता हैं कि श्रीराम ने सीता को अपने दूत की पहचान कराने के लिए मुद्रिका (अंगूठी) दी थी।
यह संभव तो नहीं था। क्योंकि रेशमी वस्त्र व अलंकारों का त्याग कर वल्कल पहनकर श्रीराम वनवास के लिए प्रस्तुत हुए थे। साथ ही सीताजी ने भी पति का अनुसरण किया था। तब तो अलंकार दोनो के ही पास नहीं थें।
अब रावण द्वारा हरण के समय सीता द्वारा मार्ग में अलंकार त्यागते जाना अथवा राम द्वारा अपनी मुद्रिका हनुमानजी को देने का क्या अर्थ हो सकता है ?

तर्कबुद्धी कहती है कि हम उन्हे वनवासी / आश्रमवासीयों के रूप में देखें। वन में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध विविध बीज (जैसे गुंजा = रत्ती = Coral Beed), कठिन कवच के फल, विशिष्ट पथ्थर, नदी में मिलनेवाले शंख - सिपियाँ, टिकाऊ घास इ. से वनवासी अलंकार बनाते हैं। 
कुछ इसी प्रकार श्रीराम ने भी अपनी प्रिय पत्नी को सजाया होगा। कुछ सीताजी ने भी अपने लिए बनाए होंगे। 

महल छोडकर पतिपत्नी स्वेच्छा से वनवासी बन ही गए थे तो उनके द्वारा वनवासीयों समान रहनसहन भी अपनाया जाना संभव हैं।

ऐसे में हम तर्क कर सकते हैं कि वन में उपलब्ध टिकाऊ घास की विशिष्ट बनावट वाली अंगूठी राम ने अपने दूत को दी होगी जिससे सीताजी को विश्वास हुआ की वे वास्तव में श्रीराम के प्रतिनिधी हैं।

परंतु सीताजी से अपनी भेंट के पश्चात हनुमानजी चुपचाप राम के पास लौटे नहीं ! क्योंकी वह साधारण वानर नहीं था, वे चतुर, युद्धनिती व कूटनिती में निपुण व दूरदृष्टी के यूथपति थे!
जिससे युद्ध निश्चित हो उस राज्य की राजसभा और नगरी का निरीक्षण करने का स्वर्णिम अवसर उन्होने निर्माण किया व रावण की राजसभा में जा पँहुचे। 
अपने बल पर उनका विश्वास देखिए कि राक्षसों से भरी राजसभा में वह रावण के समक्ष जाने का साहस कर पाएं। उद्देश रहा होगा राजसभा में उपस्थित सदस्यों का सामर्थ्य, बुद्धी, नितीकौशल्य, रावण के साथ उनके संबध व राजसभा पर रावण का प्रभाव इ. स्वयं देखकर समझने का !

इसके प्रश्चात रावण द्वारा उनकी (कथित) पूंछ को आग लगवाने के पश्चात उन्होने लंका में ही उत्पात मचाया, लंका के भवन जला दिए (संभवतः उनकी 'वानर' नामक प्रजाति का उपहास करने के लिए राक्षसो ने उनके वस्त्र में पूंछ समान लंबा कपडा जोड दिया और उसमें आग लगा दी। यदी वह उनकी पूंछ होती तो क्या उन्हे जलन नही होती?)  

हनुमानजी ने उन्हे यह सब करने दिया। उनकहेतु यह भी हो सकता हैं कि इस निमित्त से वह लंका नगरी की रचना समझे। युद्ध में व्यूहरचना की दृष्टी से उन्होने नगर का सूक्ष्म निरीक्षण किया होगा।
कहना ना होगा की राक्षस व उनकी सेना से भरे नगर में यह साहस करनेवाले वीर का बल व बुद्धी अति उच्च गुणवत्ता की ही होगी।

इसी से स्पष्ट होता हैं कि हनुमानजी प्राणीजाति के साधारण बंदरों की श्रेणी में नहीं आते है ! 

श्रीराम के जीवन के सर्वोच्च कार्य में अत्याधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले इस रामसेवक को बंदर मानने का पातक हमें नहीं करना चाहिए, हम तो उनके जैसी निश्छल भक्ति की कामना ही कर सकते हैं।

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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