#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ७१ - दि. ०३.०८.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ७१ : दि. o३.०८.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

विश्व में सत् शक्तियाँ हैं और असत् भी है । इसलिए  अन्याय - अत्याचार - हिंसा - अपराध अदि प्रत्येक युग के समाज का अंग हैं। 
सनातन हिंदु धर्म की मान्यता हैं कि प्रत्येक व्यक्ती अपने पूर्वकर्मों के फल को प्राप्त करता है। 
यह कर्म वर्तमान जन्म के  अथवा पूर्व जन्मों के भी हो सकते हैं। 
अर्थात किसी भी व्यक्ति को प्राप्त हुआ सुख अथवा दुख उसके अपने कर्मों का ही परिणाम होता हैं।

महत्वपूर्ण बात यह हैं की एक व्यक्ति का सुख दुख दूसरे व्यक्तियों  के खाते में भी प्रविष्टियाँ 
(= accounting entries) करता हैं । Commerce में इसे Double Entry system कहते हैं। 
इसके अनुसार दुसरों को सुख देनेवाले व्यक्ती के खाते में पुण्य जमा होता हैं और दुख पँहुचानेवाले व्यक्ती के खाते में पाप की गिनती बढती है। 
पापी व्यक्ती का खाता उसके दुष्कर्म, अत्याचार आदि के कारण जब भर जाता हैं तब प्रभु उसके निर्दालन की व्यवस्था करते हैं। यानि पापीयों के कर्म की अंतिम क्षम्य कडी के जुड़ते ही प्रभु की क्षमा की सीमा भी पूर्ण हो जाती हैं।

इसीलिए कंस द्वारा उत्पात की अंतिम सीमा लांघने की संभावना के कारण प्रभु के अवतार का समय हो रहा था।

कंस के अपराधों का घडा उसके अपने कर्मों से ही भर रहा था परंतु इसकी गति बढाकर प्रभु के अवतार की पूर्वपिठिका बनाने के लिए अब मथुरा के मंच पर नारदमुनि प्रकट हुए !
जिनकी वाणी नारायण को समर्पित हैं वह नारायण के मानवरुप अवतार की भूमिका बांधने के लिए मथुरा में अवतीर्ण हुए !

कंस ने मुनि का आदरसत्कार किया।
क्यो किया ?
वह तो असुर वृत्ति का था, ऐसे में, सदा ही नारायण के नाम की माला जपनेवाले मुनि के कंस द्वारा सत्कार का क्या औचित्य था ?

वृत्ति से कितने ही दुराचारी हो, परंतु ऐसे राक्षस जानते हैं कि सत् शक्तियों ने यदि संकल्प कर लिया तो उनका विनाश निश्चित है। इसलिए वे सामान्य जनता पर अत्याचार करते हैं किंतु साधारणतः वे देवताओं अथवा उनके ऐसे भक्तों के सम्मुख लीन ही रहते हैं। 

जैसे भस्मासुर ने, रावण ने शिव की आराधना की थी....
तारकासुर के पुत्रों ने और मेघनाद ने तपस्या कर ब्रह्माजी से वर माँगे थे.... 

कंस भी कदाचित नारदमुनि का सत्कार कर उन्हे अपने अनुकूल बनाने का विचार कर रहा होगा। परंतु नारदमुनि का चातुर्य तो सुविख्यात हें, वह कंस के जाल में कहाँ फसनेवाले थे ! 
उन्होने बातों ही बातों में कंस का पापों से भरा घडा छलकाने की योजना कार्यान्वित कर दी।

कंस से कुशलक्षेम पूछते पूछते उन्होने आकाशवाणी (अथवा भविष्यवाणी)संबधी चर्चा छेड दी। 
कंस ने देवकी के आठवें बच्चे की हत्या करने का संकल्प मुनि को बताया दिया।
नारद बोले,"भोले हो तुम !  आठवे बच्चे की सोचकर निश्चिंत मत रहना, गिनती एक से ही प्रारंभ हो ऐसा किसने कहा है ! आठ - सात - छह - पाँच.... ऐसी गिनती भी तो हो सकती हैं....'

कंस वैसे भी भयभीत तो होगा ही, उसे यह विचार अधिक व्याकुल करने लगा।

नारदमुनि पुनः भ्रमण के लिए चल पड़े परंतु अपने के विनाश के लिए कंस द्वारा भगवान को  आमंत्रित करने का अंतिम चरण उन्होने कार्यान्वित कर दिया था !
यद्यपि कंस ने तत्काल यह घोषणा नहीं की की वह देवकी के प्रत्येक बच्चे की हत्या करेगा, किंतु मन में तो सोचा ही होगा !

परंतु, कंस के कपट को छेद देकर सज्जनों का रक्षण और दुर्जनों का निर्दालन करने का प्रभु का वचन सत्य ही होना था जिसकी चर्चा हम जारी रखेंगे 🙏🏼

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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