#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ६० - दि. २३.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ६० : दि. २३.०७.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
आज हम रामायण की एक ऐसी व्यक्तिरेखा पर विचार करेंगे जिसमे अदम्य साहस था, बल था, जिसके पास देवताओं से प्राप्त अस्त्र थे और वर भी थे, अत्यंत संपन्न राजकुल का युवराज होने के कारण सर्व प्रकार की सुखसुविधाएँ और शिक्षा के साधन उपलब्ध थे। अर्थात वह सब था जिससे कोई भी अगली पिढियों के लिए आदरणीय, पूजनीय बन सकता हैं !
परंतु आज के सत्र के नायक इसमें से कुछ नहीं बन पाए। जनमानस में उनके लिए नकारात्मक भाव ही रहे हैं।
यह हैं रावणपुत्र मेघनाद (इंद्रजित)।
मेघनाद को रावण की द्वितीय पत्नी धन्यमालिनी का पुत्र बताया गया हैं यद्यपि इसे मंदोदरी का पुत्र भी कहा जाता हैं। इस संबध में स्पष्ट सूचना उपलब्ध नहीं है।
जन्म लेते ही मेघनाद का रोने का स्वर मेघों की गर्जना के समान गंभीर - उच्च था। इसलिए उसका नाम मेघनाद रखा गया।
मेघनाद अत्यंत बलशाली, निग्रही था। वह वीर योद्धा था। उसने तपस्या कर तीनो प्रमुख अस्त्र (ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र व नारायणास्त्र) प्राप्त किए थे। उसके पास नागशक्ती थी (जिसका उपयोग कर उसने श्रीराम व लक्ष्मण को मूर्च्छित किया था)|
उसने युद्ध में इंद्र को पराजित किया था इसलिए वह इंद्रजित नाम से भी प्रसिद्ध है |
ब्रह्माजी की घोर तपस्या कर उसने वरदान प्राप्त किए थे। उसने ब्रह्माजी से अमरत्व का वरदान माँगा, किंतु ऐसा वरदान प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होने के कारण ब्रह्माजी जी उसे नहीं दिया। तब उसने ऐसा वर मांग लिया कि उसकी मृत्यु किसी भी युद्ध में ना हो और उसी व्यक्ति के हाथों से हो जो बारा वर्षों तक सोया ना हो और मेघनाद द्वारा किए जानेवाले कुलदेवी के यज्ञ को पूर्ण ना होने दे। उसने एक दिव्य रथ का भी वरदान प्राप्त किया जिसमें आरूढ होनेपर वह अदृश्य हो जाए (संभवतः यह अति वेगवान रथ होगा जिसकी गति के कारण उसमें स्थित योद्धा को देखना असंभव हो जाएं)।
रावण के साथ युद्ध में मेघनाद ने श्रीराम और लक्ष्मण दोनों को ही नागपाश में बांध दिया। यह अनेक नागों से बना हुआ और तोडने में असाध्य बंधन है। रामलक्ष्मण के बंधन को देखते ही हनुमानजी ने विष्णुवाहन गरुडदेव का आवाहन किया। सर्प तो गरुड का आहार है इसलिए उसने सहजता से दोनो को मुक्त किया। (यह कथाभाग कीर्तनों में बताया जाता हैं। संभावना यह भी हैं की नागों के विष से दूषित बाणों का उपयोग मेघनाद ने किया होगा । उसपर गरुड नामक प्रजाति के वैद्यों ने उपचार किया होगा। )
नागशक्ती से मुक्त राम लक्ष्मण दोनों को देखकर मेघनाद संतप्त हुआ। साथ ही अपने बंधुओं के मृत्यु का कारण बने इन दोनो पर उसे अत्यंत क्रोध हुआ। उसने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग कर अति भयंकर युद्ध किया और एक शक्ति का प्रयोग कर लक्ष्मण को मूर्च्छित किया। इसका उपाय केवल रावण के राजवैद्य सुषेण जानते थे। मान्यता हैं कि हनुमानजी उन्हे उनके प्रासाद समेत ले आएं (संभवतः अत्यंत युक्तिपूर्ण व्यवस्था कर वे उन्हे राक्षस नगरी से ले आए होंगे)। उन्ही के सुझाव पर हनुमानजी संजीवनी बुटी ले आए व लक्ष्मणजी को पुनः जीवदान मिला (संभवतः उस युग में कोई अति वेगवान वाहन उपलब्ध होगा अथवा अत्युच्च आध्यात्मिक शक्तियों का उपयोग कर सूक्ष्म रूप से उन्होने संजीवनी बूटी को लाया होगा)।
दूसरी शक्ती के उपयोग के पश्चात भी लक्ष्मणजी की मृत्यु टलने पर मेघनाद के क्रोध का अंत ना था। उसने शत्रु की मृत्यु का निश्चय कर कुलदेवी निकुंबला देवी का यज्ञ आरंभ किया।
यह समाचार सुनते ही विभीषण ने मेघनाद के वरदानों संबंधी श्रीराम को अवगत कराया।
यज्ञ में बाधा डालने के लिए लक्ष्मणजी यज्ञनगर पहुंचे जहाँ यज्ञ के नियम अनुसार मेघनाद का शस्त्र ले जाना वर्जित था।
लक्ष्मणजी द्वारा यज्ञभंग करने पर मेघनाद को मृत्यु का आभास हुआ। क्योंकि लक्ष्मणजी तो उनके वध करने की दूसरी शर्त भी पूर्ण करते थे की १२ वर्षों तक जिसने निद्रा नहीं ली होगी वही उसका वध करें !
लक्ष्मणजी तो संपूर्ण वनवास काल में सोए ही नहीं थे (यद्यपि यह सामान्य जन के लिए अविश्वसनीय हैं परंतु निद्रा पर संपूर्ण विजय यह अत्युच्च कोटी की साधना है जिसका उदाहरण लक्ष्मणजी है। वे अपने ज्येष्ठ भ्राता व भावज अर्थात श्रीराम व सीताजी के रक्षणार्थ संपूर्ण वनवासकाल में जागते रहे ऐसी मान्यता है)।
लक्ष्मणद्वारा मेघनाद का वध इस युद्ध की महत्वपूर्ण घटना थी क्योंकि वह राक्षसपक्ष का सबसे कुशल योद्धा था।
विचारणीय बात यह हैं कि मृत्यु के साथ ही मेघनाद का आख्यान समाप्त होता हैं। अत्यंत पराक्रमी, बलशाली योद्धा व देवताओं से वर पाने योग्य तपस्या करनेवाले इस पुरुष का उदाहरण हम अपने बच्चों को नहीं देते है। क्योंकि मेघनाद का पक्ष अन्याय का था! अपने दादा विश्रवा अथवा परदादा ऋषि पुलस्त्य का अनुकरण कर वह ब्राह्मण नहीं बना, ना ही अत्याचारी पिता को त्यागकर उसने विभीषण समान सत्पक्ष का साथ दिया!
तात्पर्य, अनेक गुणों के होते हुए भी किसी भी व्यक्ती की पहचान उसके जीवनसंबधी तत्व और आदर्शों से होती हैं, उस की उपलब्धियों से नहीं !
....और रामायण तो आदर्श मानने और निभाने की गाथा हैं ! अतः रामगुणगान जारी रहेगा....
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें