#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ४३- दि. ०६.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ४३ : दि. ०६.०७.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
श्रीराम - सीता के विवाह की पार्श्वभूमि हमने देखी। इस दंपति के संबध में अधिक विचार करने से पूर्व हम रामचरित्र के कुछ अन्य भागों पर भी विचार करेंगे जिससे रामसीता का आख्यान समझ पाना सुलभ होगा।
जिस प्रकार नॉस्ट्रडेमस की भविष्यवाणियाँ सीधे सपाट शब्दों में नहीं लिखी गई हैं व हमें उनका अर्थ 'समझना' पडता हैं, बिलकुल उसी प्रकार काव्य रुप में लिखे गए रामायण नामक इतिहास को भी समझना होगा।
आइये, हम उदाहरण से समझे 👇🏼
अहल्या की गाथा सब जानते हैं। इन्द्र द्वारा बलात्कार के पश्चात अहल्या शिलारूप बन गई और वर्षों बाद श्रीराम के पदस्पर्श से उनका उद्धार हुआ यह हम सुनते आए हैं।
अहल्या के प्रसंग को हम यथार्थ रुप में समझने का प्रयास करेंगे।
आश्रम के कुलपति ऋषि गौतम और की पत्नी थी अहल्या। आश्रम में एक यज्ञ के लिए देवराज इंद्र पधारे (इंद्र यह व्यक्ति नहीं है, पद हैं। अर्थात देवों की नगरी के राजा। अपने पराक्रम के आधारपर यह राजा बदलते रहते थे - जैसे देवलोक के निवासियों को पराजित कर महिषासुर इंद्र बन बैठा था जिसका अंततः देवी ने वध किया।)
यह इंद्र पराक्रमी अवश्य रहें होंगे किंतु विषयासक्त थे। अनिंद्य सुंदरी अहल्या को देखते ही इनका मन डोल गया।
जब ब्राह्ममुर्हुत में ऋषि गौतम प्रातःवंदना के लिए नदी की दिशा में चले गए तब अंधेरे में इंद्र ने उनकी कुटी में प्रवेश कर अहल्या का बलात्कार किया।
आश्रमवासीयों ने कदाचित अहल्या को अपराधी ना भी माना हो, परंतु पतिता अवश्य मान लिया। पति और पुत्र के हित के लिए अहल्या ने स्वयं को उनसे विलग कर लिया। वे वन में एकाकी जीवन जीने लगी।
तथाकथित सभ्य व सुसंस्कृत समाज, जो सत्ताधीश बलात्कारी को शासन करने का धैर्य तो नहीं रखता, उसने निर्दोष अहल्या के स्वयंघोषित एकांतवास को जैसे 'उसके पापों के प्रायश्चित्त' मान लिया।
पत्नी ने ऋषि गौतम को समाज में रहकर अपने पुत्र शतानन्द के पालन - पोषण व उचित शिक्षा का दायित्व दिया होगा व मन से विदिर्ण पति अपने पुत्र के हित में पत्नी के निर्णय को स्वीकारने के लिए बाध्य रहे होंगे !
वर्षों तक अहल्या एकांतवास में उपेक्षित ही रही होगी। आगे चलकर पुत्र शतानंद मिथिला नरेश के राजगुरु के पद पर आसीन हुए परंतु इधर अहल्या की कुटी में ना तो सगे - संबधी आ पाए होंगे ना अतिथि आए होंगे!
मानव समाज से पूर्णतः विलग होकर कैसे रहीं होंगी वे !
यह जीवन अभिशप्त, दयनीय व करुण था ! सारांश, अत्यंत विद्वान पति व पुत्र के होते हुए भी अहल्या एक शिला के समान कठिन जीवन जी रही थी।
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की प्रेरणा से श्रीराम निबिड वन में एकाकी जीवन को अभिशप्त उस अभागिनी की कुटी में पधारे, उन्होने अहिल्या का आतिथ्य ग्रहण किया व अपने सौहार्दपूर्ण व्यवहार से अहल्या को आल्हादित कर अपनी यात्रा पुनः आरंभ की |
श्रीराम द्वारा अहल्या आश्रम की भेंट सामान्य घटना नहीं थी। जिसे समाज ने पतिता का कलंक देकर समाज से बहिष्कृत, निष्कासित कर दिया था, पति - पुत्र से दूर होने को बाध्य कर जिसके मन पर निर्घृणता से प्रहार किये थे उसे भी पूजनीय-आदरणीय गुरुमाता का सम्मान देकर साक्षात रघुकुल के भावी राजा ने समाज में पुनर्स्थापित करने की पहल की थी !
सोचिए, उस युग में समाज द्वारा धिक्कारित बलात्कारित स्त्री को ससम्मान समाज के मुख्य प्रवाह में लाने की श्रीरामजी की यह पहल कितनी साहसपूर्ण हैं !
प्रेमविहिन जीवन की कालरात्री बिताने के पश्चात अब अहल्या अपने पति पुत्र के साथ पुनः रह पायी होगी। सारांश, शिला समान जीवन जीने को बाध्य एक पतिव्रता को पुनः गौरवपूर्ण जीवन का अधिकार देना यही अहिल्या उद्धार हैं !
.... सीताजी को लेकर श्रीरामजी पर जो आक्षेप लिए जाते हैं उन्हे श्रीरामजी के इस न्यायपूर्ण व्यवहार के आलोक में देखना चाहिए।
अनर्गल बोलनेवालों के शब्दों पर विश्वास करना हमारी बाध्यता नहीं हो सकती, हमें तर्कबुद्धी से 👆🏼 यह सब सोचना ही होगा !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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