#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ४४- दि. ०७.०७.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ४४ : दि . ०७.०७.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
रामायण यह रामचरित्र ही हैं। इतिहास का यह अध्याय श्रीरामजी को केंद्र में रखकर ही लिखा गया है। इसी कारण रामायण के अन्य पात्रों के व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण पहलुओं पर साधारणतः उतनी बारीकी से विचार नहीं किया जाता हैं।
हनुमानजी अनन्य रामभक्ती के कारण वंदनीय बने हुए हैं, परंतु सीताजी का व्यक्तित्व तो श्रीरामजी की छाया में दब सा गया है।
सीताजी की व्यक्तिरेखा पर भी हम विचार करें जिससे हम रामचरित्र भी वास्तविक रूप में समझ पाएंगे।
सीता साधारण कन्या नहीं थी। भगवान विष्णु व देवी लक्ष्मी श्रीराम व सीता के रूप में अवतरित हुए थे।
सीता के लिए अज्ञात माता पिता की कन्या बनने की कोई बाध्यता नहीं थी, यह योजनापूर्वक किया गया हैं।
एक मातृपितृविहीन अनाथ बच्ची भी अच्छे संस्कारों को ग्रहण कर कितनी गरिमामय बन सकती है इसका यह वास्तविक उदाहरण (real life example) है।
जिस अजगव धनुष्य पर प्रत्यंचा चढाने का पण सीतास्वयंवर के लिए रखा गया था उसी शांकरधनुष्य को बाल्यावस्था में ही सीता ने अपने एक ही हाथ से उठाया था। इसी से समझ सकते हैं कि रामायण यह गाथा सीता द्वारा प्रभु की छाया 'बनने' की है, 'बनाने' की नहीं !
जो कन्या भगवान शिव का धनुष्य उठाने में समर्थ थी उसे रावण 'उठाकर' ले गया यह संभव हो सकता हैं क्या ?
मान्यता यहीं हैं कि भारतवर्ष को राक्षसों के आतंक से मुक्त करने के लिए रामायण का पट बनाया गया था !
इसी कथा के भाग स्वरूप अन्य समांतर आख्यान भी चल रहें हैं जिन्हे हम संदर्भ के अनुसार देखेंगे।
अभी हम सीताजी की व्यक्तिरेखा समझने की ओर बढते है।
श्रीरामजी के वनवास के प्रसंग तक सीताजी श्रीराम का छायारुप बनी रही। श्रीराम के वनवास के लिए प्रस्तुत होते ही सीताजी का वास्तविक उज्वल रुप उभरकर आया। वनवास के कष्टों को मन से पूर्णतः स्वीकार कर उन्होने पति के साथ वल्कल धारण किए।
यह उनका अपना निर्णय था, बाध्यता नहीं थी !
परंतु सोचिए, राम यदि अकेले ही वन में जाते तो ? अयोध्या से लंका तक समाज को राक्षसों से मुक्ती देने का जो अभियान रावणवध से चरमसीमा पर पहुँच पाया था वह सीताजी की अनुपस्थिति में कदाचित संभव ना हो पाता।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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