#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ३३- दि. २६.०६.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ३३ : दि. २६.०६.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
देवीआख्यान में अब हम शुंभ - निशुंभ इन असुरों के वध में निहित अर्थ को समझेंगे।
शुंभ तथा निशुंभ राक्षसों के सेवक चंड व मुंड ने अंबिकादेवी को देखा। उन्होने तत्काल शुंभ के पास जाकर देवी के अतिसुंदर रूप का वर्णन किया व उसे अपनी आश्रिता बनाने का आग्रह किया।
शुंभ के मन में लालसा उत्पन्न हुई और उसने अपने सुग्रीव नामक दूत को उस सुंदरी को ले आने का आदेश दिया।
दूत ने शुंभ के सामर्थ्य का वर्णन किया, ऐश्वर्य का लोभ दिखाया व शुंभ से विवाह का आग्रह किया।
माता मन ही मन मुस्कराई किंतु दूत से कहा , "सत्य है, शुंभ तो त्रैलोक्य का स्वामी है, किंतु मैं हतबल हूँ। मेरी प्रतिज्ञा हैं कि जो मुझे युद्ध में पराजित करेगा उसीसे विवाह करूंगी। इसलिए शुंभ से कहो की मेरा युद्धकौशल का गर्व नष्ट करें व मुझे युद्ध में पराजित कर मेरा पणिग्रहण करे."
देवी का भाषण सुनका दूत क्रोधित हुआ और उसने शुंभ के सामने विस्तारपूर्वक इसका वर्णन किया।
दैत्यराज भयंकर क्रोधायमान हुआ और उसने अपने सेनापती धूम्रलोचन को आदेश दिया कि बालों से घसीटकर उस सुंदरी को ले आए व उसके सारे रक्षकों के प्राण हर लिए जाए ।
मदोन्मत्त धूम्रलोचन ने देवी को ललकारा तब माता ने उस का दाह कर भस्म कर दिया। राक्षसों की भयंकर सेना के साथ देवी का युद्ध प्रारंभ हुआ। इसी समय देवीवाहन सिंह भी राक्षसों का संहार करने लगा।
अपने सेनापती व सैन्य के विनाश की वार्ता सुन शुंभ क्रोध से कांपने लगा व उसने चंड व मुंड को उस सुंदरी को अपमानित कर बलपूर्वक लाने की आज्ञा दी।
चंड - मुंड ने सेनासह आक्रमण करने पर देवी का मुख क्रोध से काजल समान काला हुआ, यही देवी का कालीरूप है!
कालीदेवी के हाथ में खड्ग (तलवार) है, वह व्याघ्रचर्म पहनती है, गले में नरमुंड माला हैं , उसका मुख विकराल व जीभ बाहर हैं तथा आँखे लाल है।
सारांश , यह देवी का विकट रुप है जो दुष्टों के निदोलन के लिए है, हम भक्तों के लिए नहीं !
कालीदेवी भयंकर गर्जना तथा क्रोध से विकट हास्य करते हुए दैत्यसेना से युद्ध करने लगी। राक्षससेना का पूर्ण संहार करते करते माता ने चंड - मुंड दोनो का शिरच्छेद कर दिया !
तप्तश्चात कालीदेवी ने चंडिकादेवी से शुंभ - निशुंभ के वध करने की प्रार्थना की।
कल से हम शुंभ निशुंभ वध के अध्याय की ओर बढेंगे।
आज के आख्यान में वर्णित कथा का सार (मर्म) किंतु अत्यंत मार्मिक है। हम इसे बिंदु रुप में समझेंगे। इसे आजके संदर्भ में कहाँ और कैसे देखना है यह आपके अपने विवेक पर निर्भर है, परंतु इनपर👇🏼 विचार अवश्य करें -
(१) सुंदर स्त्री को देखते ही राक्षसों की लार टपकती है। यह सौंदर्य देखकर उन्हे विधाता की सृजनशीलता के प्रति आदर की भावना नहीं होती, उन्हे उस स्त्री को अपनी भोग्या बनाने की वासना होती है।
रुप के कारण तो नही परंतु👆🏼 ऐसी वृत्ती के कारण राक्षस तो आज भी हैं ! तो हमें उनके प्रतिकार की सज्जता रखनी ही होगी।
(२) देवी चतुर हैं , युद्धनीति में कुशल ! विवाह के लिए पूर्व में प्रतिज्ञा की हैं कहकर दूत के माध्यम से संदेश भेजा। अब क्रोधित आक्रमणकारी तो कुछ काल के पश्चात ही आएंगे। अर्थात, युद्ध की तैयारी के लिए समय की व्यवस्था कर ली।
सारांश, शत्रु का कथन मूर्खतापूर्ण / आक्रमक / आव्हानपूर्ण होनेपर भी बुद्धी का संतुलन रख युद्धसज्जता करने के लिए समय निकाल लेने की सीख जिसका real life example हैं छत्रपती शिवाजी महाराज की रणनीति !
(३) अपना कोमल - मनोहारी रूप प्रेम करनेवालों के लिए है, शत्रु के लिए तो शस्त्र ही रहेंगे तथा रुप तो महाकालीदेवी जैसा उग्रभयंकर होगा।
अब इस नरमुंड माला को अन्यथा ना लें । यह कोई सीदेसादे देवभक्त नम्र मानवों के मस्तक नहीं थे ! मानवयोनि में भी राक्षसी कृत्य करनेवाले अत्याचारियों का वध कर माता ने उनके मस्तकों की माला ही कंठ में धारण कर ली !
राक्षस भी तो देखें कि सुंदरी पर वक्रदृष्टी पडते हीं वह कितनी प्रचंड - कितनी आक्रमक - हिंसक होती है !
स्वरक्षा का अधिकार सबको है, इसलिए कुवासना लेकर स्त्री के पास जाएंगे तो नरमुंडमालधारिणीदेवी का रौद्ररूप ही पाओगे, वत्सल पार्वती - सरस्वती - अन्नपूर्णा - सरस्वती का नयनसुखद रुप नहीं, यह जताना भी आवश्यक ही हैं !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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