#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ११७ - दि. १८.०९.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग ११८: दि. १९.०९.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

अर्जुन द्वारा प्रायश्चित के रुप में बारह वर्षों का स्वयंघोषित वनवास किया गया। इसी काल में अर्जुन द्वारा तीन विवाह किए गए। 
नागकन्या उलुपी के साथ, मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा के साथ व वनवास के अंतिम चरण में सुभद्रा हरण का प्रसंग हुआ था।

तो क्या अर्जुन ने वनवास काल में ब्रह्मचर्य का पालन ना कर नियमभंग किया था ?
अथवा अर्जुन की स्त्री में आसक्ती इतनी प्रबल थी की उन्होने इस प्रकार नियम तोडकर तीन विवाह कर लिए ?

स्थूल रूप से (superficially) देखेंगे तो ऐसे प्रश्न स्वाभाविक हैं। किंतु धर्म का मर्म समझना और उसके अनुसार धर्माचरण करना यह पाण्डवों की विशेषता थी।

घोडे की आँखो पर आवरण (Blinkers) लगाने के कारण उसकी दृष्टी सिमित हो जाती है और वह केवल सामने ही देख पाता हैं। इस प्रकार आवरण चढाकर धर्म को नहीं देखना चाहिए। 
गहन विचार कर धर्मपालन का उद्देश समझ कर निश्चित धेय्य की प्राप्ति (जो सबके लिए कल्याणकारी हो और विनाशकारी तो निश्चित रुप से ना ही हो) के लिए की गई कृति को ही धर्मपालन कहा जा सकता है !
इस दृष्टी से अर्जुन के बारह वर्षों के वनवास काल को हम उनके जीवन के अन्य प्रसंगो के आलोक (प्रकाश) में देखेंगे।

साथ ही महाभारत काल के अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों द्वारा धर्मपालन की व्याख्या किस प्रकार खींची गई जिससे वह विकृत ही हो गई यह भी हम अगले भागों में देखेंगे।

वनवास काल में अर्जुन द्वारा द्रौपदी के विषय में ब्रह्मचर्य निहित था। किंतु अन्य विवाहों के लिए ऐसा कोई बंधन नहीं था। इस दृष्टी से अर्जुन ने धर्म के विपरित आचरण नहीं किया था यह स्पष्ट है।

उलुपी व चित्रांगदा दोनो ही अर्जुन पर स्वयं लुब्ध हुई थी। प्रणय याचना कन्याओं की ओर से की गई थी, अर्जुन ने इसकी पहल नहीं की थी। उस युग में स्त्री द्वारा ऐसी कामना करनेपर पुरुष द्वारा उसकी इच्छापूर्ति करने को पुरुष का धर्म माना जाता था। 
फिर यह विवाह उलुपी और चित्रांगदा दोनों के ही अपने राज्य में हुए थे। उलुपी ने पिता का आशीर्वाद ना मिलने की आशंका से स्वयं ही अर्जुन से विवाह किया था। और चित्रांगदा ने अपने मायके के संरक्षण में, अपने पिता - मणिपुर के राजा ब्रभुवाहन - के आशीर्वाद से अर्जुन का वरण किया था। इसलिए अर्जुन के धर्मपालन के विषय में कोई संदेह नहीं हैं !

रही बात सुभद्रा हरण की, तो क्या अपने आराध्य देव श्रीकृष्ण के आशीर्वाद के बिना अर्जुन उनकी बहन का हरण कर सकते थे ?
वस्तुतः श्रीकृष्ण और सुभद्रा के ज्येष्ठ भ्राता बलराम सुभद्रा का विवाह अपने प्रिय शिष्य दुर्योधन से करना चाहते थे। स्वाभाविक था की इस अनर्थ से श्रीकृष्ण सुभद्रा को ही नहीं बल्कि यादवों को भी बचाना चाहते थे। तो उन्होने कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनने दी जिसके अंत में अर्जुन द्वारा सुभद्रा हरण किया गया और उन्होने उससे विधिवत विवाह किया।

इन सारे प्रसंगों को अर्जुन की विषयासक्ति नहीं मानना चाहिए। श्रीकृष्ण के परम प्रिय थे अर्जुन ! तो कोई अतिरिक्त वैषयिक भावना वाला अधर्मी व्यक्ती भगवान का प्रिय हो सकता है क्या?

अर्जुन का चरित्र देखें तो वैसा अवसर अथवा सुविधा होनेपर भी स्त्री प्रसंग के संबध में वह निर्मोही और धर्मशील ही रहें है।

जैसे द्रौपदी स्वयंवर में विजय अर्जुन का हुआ था परंतु कुटुंब के हित के लिए उन्होने परम सुंदरी द्रौपदी के साथ अपने चार भ्राताओं का विवाह भी स्वीकार किया ! 
क्या कोई विषयासक्त व्यक्ति ऐसा कर सकता हैं ?

दूसरा प्रसंग उनके देवास्त्र प्राप्त करने के लिए देवभूमि अमरावती जाने का हैं। अर्जुन ने अप्सरा उर्वशी का नृत्य बहुत ध्यान से देखा और वह नृत्यकौशल पर मोहित हुए। इसे आसक्ति समझकर उर्वशी ने उन्हे रतिनिमंत्रण दिया।
किंतु अर्जुन ने कहा की वह उनके पूर्वज पुरुरवा की पत्नी थी इसलिए उनके लिए माता समान हैं।
जिसके पास अप्सरा स्वयं आई हो, वह व्यक्ति यदि इतनी निर्मल भावना रखे तो उसे 'कामी पुरुष' कैसे कहा जा सकता हैं ?

तीसरा प्रसंग पाण्डवों के अज्ञातवास के अंत के पश्चात घटित हुआ था। कुरुओं की बलशाली सेना से 'बृहन्नला' ने मत्स्य देश की रक्षा की, उनका गोधन वापस दिलाया। राजा विराट को जब बृहन्नला का सत्य स्वरूप - अर्थात अर्जुन - ज्ञात हुआ तब उन्होने अपनी कन्या उत्तरा से विवाह करने का अनुरोध अर्जुन से किया।
अर्जुन ने कहा की एक वर्ष तक उत्तरा को नृत्य व संगीत की शिक्षा देते समय उनका संबध गुरु और शिष्या का रहा है जो पिता - पुत्री समान होता है और उनके मन में भी उत्तरा के लिए पितृवत् वात्सल्य भावना ही है , कामाकर्षण नहीं हैं। उन्होने उत्तरा का विवाह अभिमन्यू से कर उसे अपनी पुत्रवधु बनाने का प्रस्ताव रखा जिसे राजा विराट ने स्वीकार किया। यद्यपि अभिमन्यू केवल सोलह वर्ष के थे और आर्यों की पद्धति / मर्यादा के अनुसार यह पुरुष की विवाहयोग्य आयु नहीं थी। किंतु अर्जुन राजा विराट का मान रखना चाहते थे। एक वर्ष का अज्ञातवास जिनके राज्य में किया हो उनके प्रति वह कृतघ्न भी नहीं होना चाहते थे।
सोचिए, अर्जुन जैसे प्रौढ व्यक्ती के लिए एक पन्द्रह - सोलह वर्ष की राजकुमारी का प्रस्ताव अत्यंत विनम्रता से उसके पिता ने दिया हैं , और क्षत्रियों में बहुपत्नीत्व प्रचलित था, जिसमें कन्या की आयु का विचार भी नहीं होता था, फिर भी अर्जुन को मोह नहीं हुआ था।

उपरोल्लिखित प्रसंग अर्जुन का शुद्ध मन और चारित्र्य स्वयं स्पष्ट करते हैं !

तात्पर्य , नियम तोडना अथवा पालन करना यह बहुत ही स्थूल कल्पना हैं। अर्जुन से नियमभंग का पातक तो नहीं ही हुआ था किंतु जिन्हे हम अत्यंत धर्मशील और नियमबद्ध व्यक्ति मानते हैं उनके द्वारा धर्म का सम्मान किया गया अथवा नहीं इसपर हम आगे विचार करेंगे !

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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