#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १३० - दि. ०१.१०.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १३०: दि. ०१.१०.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

आचार्य द्रोण की अपनी मनोभूमिका की चर्चा हमने पिछले भाग में की थी।

कई बार मनुष्य से भूल होती हैं परंतु विचार करनेपर अथवा कुछ समय पश्चात उसे अपनी भूल पर पछतावा होता हैं, किसी के संबंध में बनाया हुआ मत सत्य ना होने की बात समझ में आती हैं अथवा किसीपर किया हुआ क्रोध अनावश्यक था यह साक्षात्कार होता हैं।

किंतु यह तब होगा जब मनुष्य सच्चरित्र व्यक्तियों के साथ रहेगा, शांति के वातावरण में रहेगा।

द्रोण के लिए यह संभव नहीं हो पाया क्योंकि वह धृतराष्ट्र को देखते रहे, जिसपर अधिकार ही ना हो उसपर अनधिकार कब्जा कर उपभोग लेने का उदाहरण देखते रहे। इसलिए द्रुपद से उन्होने जो अपेक्षा की थी वह न्याय्य थी ही नहीं यह वे समझ ही नहीं पाए।

अब ऐसा भी नहीं हैं कि दूसरे प्रकार का उदाहरण उनके सम्मुख नहीं था। 
पितामह भीष्म थे ! 
कुरु साम्राज्य के समर्थ और लोकप्रिय युवराज होते हुए भी उन्होने जिस प्रकार राज्यत्याग किया था और ब्रह्मचर्य की शपथ ली थी उसे कौन नहीं जानता था ! सत्ता, संपत्ति और सुखोपभोग के सभी साधनों के स्वेच्छा से किए गए त्याग की मूर्ति द्रोण के सम्मुख थी किंतु उन्हे धृतराष्ट्र का ही मार्ग अच्छा लगा।

ईश्वर आपके सामने खडे होकर धर्म पर व्याख्यान नहीं देंगे, ना उँचनीच समझाएंगे, ना ही जीवन के प्रत्येक मोड पर उँगली पकड पकड कर खींचते रहेंगे। वह आपके लिए योग्य और अयोग्य की पहचान करने के लिए उदाहरण रखते हैं। अब यह मनुष्य को सोचना हैं कि उसे किस मार्ग पर चलना हैं !

द्रोण को धृतराष्ट्र का मार्ग अनुकरणीय लगा, भीष्म का नहीं !

और एक बार द्रोण ने पतन के इस मार्ग को चुन ही लिया तो उनका व्यवहार प्रतिशोध की भावना से परिचालित (Driven by revangeful attitude) होता रहा। और प्रतिशोध ना तो स्वयं के लिए वांछनीय हैं, ना समाज के लिए।

द्रोण के मन में प्रतिशोध की भावना इतनी प्रबल थी की उन्होने द्रुपद को पूर्णतः लज्जित और पराजित करने की ठान ली।
कौरव व पाण्डवों की शिक्षा पूर्ण होनेपर जब शिष्यों ने गुरुदक्षिणा देने संबधी पृच्छा की तब द्रोण ने उनसे कहा कि वह द्रुपद को पराजित कर उनका आधा राज्य द्रोण को दिलाएं। 
दुर्योधन और उसके भाई तो नहीं कर पाए परंतु अर्जुन ने अपने भ्राताओं के साथ मिलकर गुरुदक्षिणा की प्रतिज्ञा पूर्ण की। पांचाल राज्य विभाजित हुआ और द्रोण को अहिछत्र का राज्य मिला। 

पाण्डवों की ऐसी कोई अपनी इच्छा तो नहीं थी परंतु गुरु जब गुरुदक्षिणा देने की आज्ञा देते हैं तो शिष्य को उसके औचित्य पर विचार करने की स्वतंत्रता नहीं होती है। 
पाण्डवों का पांचालराज से क्या विरोध हो सकता था ? 
परंतु द्रुपद को पराजित और अपमानित कर उनका आधा राज्य छीन लेने का निर्णय द्रोण का था, पाण्डवों का नहीं !

समाज के लिए भी यह घटनाक्रम अहितकारक ही रहा। 
इसके पूर्व पांचाल और कुरुओं के संबध जैसे भी रहे हो, परंतु अब पांचालों ने द्रोण को आश्रय देनेवाले कुरुओं से शत्रुता पाल ली। 
द्रौपदी का विवाह पाण्डवों से होनेपर भी पांचालों ने कुरुओं को क्षमा नहीं की थी। 
द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न आचार्य द्रोण के शिष्य होते हुए भी उनके शत्रु बन गए। उन्होने ही युद्ध में आचार्य द्रोण को मार डाला। प्रतिशोध की भावना में जलकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने धृष्टद्युम्न के साथ सभी पाण्डवपुत्रों की निद्रावस्था में हत्या कर दी।

इसी से स्पष्ट होता है किं कुसंगति से कुविचार उत्पन्न होता हैं और वह अनर्थ का कारण बनता हैं।
किंतु सुसंगति मनुष्य के चारित्र्य को कैसे उँचाई पर ले जाती हैं इसके उदाहरण भी हम देखेंगे।

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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