#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग ८५ - दि. १७.०८.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग  ८५ : दि. १७.०८.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

कंस मृत्युभय से ग्रस्त था।
इतनी सावधानी, इतना बंधन और इतने कडे पहरे के उपरांत भी देवकी के पुत्र का जिवित रहना आश्चर्य, क्रोध व अतीव चिंता का विषय था।
राज्य के सभी नन्हे शिशुओं की सूचना प्राप्त करने के लिए उसने गुप्तचरों और सैनिकों के दल  भेजे ।

गोकुल के नंदपुत्र कान्हा की वार्ता कंस तक पहुँची थी। 
नंद और वसुदेव की मैत्री के संबंध में कंस जानता था और उसे संशय था कि वसुदेव ने किसी प्रकार अपने पुत्र को नंद के घर भेजा हैं और नंद के घर पल रहा कृष्ण नामक वह पुत्र वास्तव में वसुदेव - देवकी का हैं ! 
परंतु गुप्तचरों की सूचना कंस के संशय का समर्थन नहीं कर रही थी। क्योंकि यशोदा के गर्भवती होने की पुष्टी गोकुल में सभी ने की थी। देवकी की प्रसूति की रात्री में ही यशोदा की भी प्रसूति की सूचना कंस को विचलित तो कर रहीं थी परंतु वह संयोग भी हो सकता था। नंद के उस पुत्र की सीधे - सीधे हत्या करने का कौनसा कारण कंस दे सकता था ! 

परंतु कंस संशय से अस्वस्थ था। उसने पूतना को इस बालक की हत्या करने का कार्य सौंप ही दिया।
पूतना गोकुल में आ पहुँची । उसने अपने वक्ष में विष लगाया और मन में एक भयंकर योजना लेकर वह नंद के घर पहुँची।

यशोदा गोकुल के प्रधान की पत्नी थी, परंतु थी तो ग्वालिन ही। उसे घर के काम होते थे, गौशाला धोना, दूध निकालना, दही बिलोना, मख्खन बनाना यह काम उसे भी होते थे। 
मथुरा के हाट (market) में दूध, दही, मख्खन यह सब भेजने के लिए मटकों में भरकर रखना पडता था।

'कान्हा की बाललीलाओं की किर्ती सुनकर उसे देखने का मन हुआ' यह यशोदा को बताते हुए पूतना ने मोहमयी मुस्कान बिखेरी। 
यह तो आजकल हो ही रहा था। आसपास के गाँवो से कान्हा को देखने देहाती लोग आते - जाते रहते थे। इसलिए यशोदा ने इस स्त्री को भी घर में बुलाया जहाँ कान्हा खेल रहा था।

उसके लिए पानी - छाँछ लाने यशोदा घर के भीतर गई तो पूतना कान्हा को उठाकर वायुवेग से घर के बाहर निकल गई। 
इस समय कदाचित गोकुल में सब अपने कामों में व्यस्त होंगे, पथ पर वेग से चलती पूतना को संभवतः किसी ने उतने ध्यान से नहीं देखा होगा।

गोकुल के बाहर आकर पूतना एक जगह बैठ गई । उसने वक्ष से वस्त्र हटाकर कृष्ण को दूध पिलाना आरंभ किया।
वह निश्चिंत थी ।
विष पुता वक्ष और यह नन्हा बालक... उसके लिए यमदूत आने में कितना समय लगता !
परंतू थोडे ही समय में पूतना को विचित्र भावना हुई। यह बालक था की अभीतक उससे चिपककर स्तनपान कर रहा था और दूसरे स्तन को उसने पक्का पकड रखा था।
पूतना ने उसे दूर करने का प्रयत्न किया परंतु बालक दुग्धपान में निमग्न था, उसने ना मुख दूर किया ना हाथ....
पूतना के गात्र शिथिल होने लगे।
उसका शक्तिपात हो गया, मुख कांतिहीन होने लगा और थोडे ही समय में वह निष्प्राण होकर भूमि पर गिर पड़ी।

पूतना की मृत्यु का वर्णन अत्यंत चमत्कारी प्रकार से किया जाता हैं। बताते हैं कि कान्हा द्वारा प्राणहरण के पश्चात वह अपने मूल राक्षस रुप में आ गई। उसका शरीर बारह मील तक लंबा होकर भूमि पर गिर पडा और उतनी भूमि के सारे लता वृक्ष उसके शरीर से कुचले गए।

इसे अतिरंजित वर्णन माने तो यहीं समझा जा सकता है कि कान्हा को घर में ना देखकर यशोदा घबराई और सहायता के लिए उसने सबको पुकारा, तब ढूँढते हुए वन में पहुँचनेपर सबने देखा की एक दीर्घाकार स्त्री निष्प्राण होकर भूमि पर गिर पडी हैं और कान्हा उसके बाजू में बैठकर खेल रहा है।

इस अघटित की वार्ता गोकुल के साथ आसपास के गाँवों में और मथुरा में भी वायुवेग से प्रसारित हुई। 
कंस के राक्षसी सेवको / सहचरों में से अतिक्रूर पूतना की ऐसी मृत्यु से प्रजा आनंदित भी हुई और उनके कान्हा के प्रति प्रेम को अधिक ज्वार (=tide / भरती ) आ गया।

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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