#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १०८ - दि. ०९.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १०८: दि. ०९.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
हमने इसके पूर्व के एक भाग में देखा था कि श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र पर अर्जुन को भगवद् गीता के रुप में जो उपदेश किया था वह वास्तविक रुप से उनके अपने जीवन का सार हैं।
क्योंकि कृष्ण जो करते हैं वहीं कहते हैं और जो कहते हैं वहीं करते हैं।
दुर्योधन पाण्डवों का चचेरा भाई था। पाण्डवों से उसने केवल बैर ही किया। उनकी हत्या के प्रयत्न किए, उनका राज्य छीन लिया।
परंतु इधर दुर्योधन कृष्ण का समधी था।
दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा श्रीकृष्ण - जांबवती के पुत्र सांब की पत्नी थी।
परंतु श्रीकृष्ण ने नातेसंबधों को महत्व तभी दिया जब उनके वह सगेसंबधी न्याय और धर्म के मार्ग पर चलते हो। अन्यथा उन्हे उनके दुष्ट कर्मों के अनुसार दण्ड देने में वह कभी भी नहीं चूंके हैं !
इसलिए यह स्पष्ट हैं कि कृष्ण का पाण्डवों के प्रति प्रेम इसलिए नहीं था की वह उनकी बुआ के पुत्र थे, वरन् पाण्डवों की धर्मनिष्ठा ने श्रीकृष्ण को उनका मार्गदर्शक और संरक्षक बनाया है!
अनेक प्रसंगों में राजपुरुष विचित्र स्थिति में एक दूसरे के सामने आते थे।
जैसे द्रौपदी के स्वयंवर में मद्र देश के राजा शल्य ने अन्य राजाओं के साथ पाण्डवों पर धावा बोल दिया था। क्योंकि शल्य द्रौपदी के स्वयंवर में प्रतियोगी के रूप में उपस्थित थे और एक निर्धन ब्राह्मण (अर्जुन) ने स्वयंवर की प्रतिज्ञा पूर्ण कर द्रौपदी को पा लिया हैं यह देखकर क्रोधित - अपमानित शल्य पाण्डवों से ही युद्ध करने लगे थे।
मद्र देश की राजकुमारी माद्री पाण्डुपत्नी थी। नकुल और सहदेव की जन्मदात्री व नाते से युधिष्ठिर, भीम व अर्जुन की माता। इस नाते माद्री के भाई शल्य पाण्डवों के मामा हुए।
पाण्डवों ने अपना परिचय नहीं दिया था इसलिए शल्य ने नाता नहीं समझ पाएं । किंतु स्वयंवर में विजयी प्रतियोगी का विरोध अधर्म हैं और ऐसा अधर्म शल्य के साथ ही वहाँ उपस्थित अनेक राजा व राजकुमार कर रहे थे। इनमें दुर्योधन भी था (यद्यपि यह सांब - लक्ष्मणा के विवाह के पूर्व की घटना हैं )।
ऐसे विकट समय में श्रीकृष्ण ने ना तो अहिंसा का जयजयकार किया, ना दया - क्षमा - शांति के पाठ पढाए, ना ही निष्क्रिय शरणागती का उपदेश किया।
स्वयंवर में पराजित होने के कारण अपमानित, क्रोधित और असंतुलित राजाओं की भीड ने पाण्डवों पर आक्रमण किया था और अपने संपूर्ण तेज व शौर्य के साथ उन्हे पराजित करने के लिए पाण्डवों ने शस्त्र हाथ में लिए थे।
श्रीकृष्ण ने उनका उत्साह बढाया क्योंकि अधर्मियों को कुचलने में वह तनिक भी नहीं झिझकते है❗
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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