#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १०६ - दि. ०७.०९.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १०६: दि. ०७.०९.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
विश्व के विभिन्न धर्म, संस्कृति व समाजों में स्त्रियों की स्थिति में भी भिन्नता पायी जाती है।
मातृसत्ताक संस्कृतियों में स्त्रियों को स्वातंत्र्य हैं और निर्णय का अधिकार भी हैं / था।
पितृसत्ताक पद्धति में कहीं स्त्रियों की स्थिति अच्छी हैं तो कहीं शोचनीय हैं। कहीं उन्हे पूर्ण सम्मान दिया जाता हैं और उनके मतों का, उनकी इच्छाओं का आदर किया जाता हैं। ऐसे में उन्हे अपना पति चुनने का अधिकार भी होता हैं। वे कमाऊ भी होती हैं और अपनी कमाई संबधी निर्णय लेने की अधिकारिणी भी होती है।
इसके विपरित कहीं उन्हे पूर्णतः पुरुषों के अधीन रहना पड़ता हैं। उनके मतों का सम्मान नहीं हैं, उन्हे शिक्षा के अवसर नहीं हैं, कमाने का अधिकार नहीं हैं, उनके वस्त्र को लेकर और समाज में उनके विचरण पर अनेक बंधन हैं, वैधानिक (legal) दृष्टी से उनका स्थान पुरुषों से कम हैं।
इस पार्श्वभूमि पर श्रीकृष्ण की अष्टभार्याओं में से चार भार्याओं ने स्वयं श्रीकृष्ण को पति के रूप में चुना और इनमें से भी कालिंदी को छोड़कर रुक्मिणी, मित्रविंदा और लक्ष्मणा ने अपने परिवार की इच्छा ना होने के उपरांत भी किसी प्रकार श्रीकृष्ण तक संदेश भेजकर अंततः उन्हें पति के रुप में प्राप्त किया यह वास्तविकता हिंदु संस्कृति में स्त्रियों का स्थान - सामर्थ्य व अधिकार की ओर निर्देश करती हैं।
इसका अर्थ यहीं हैं कि हिंदु कन्याएँ तब भी तेजस्विनी हुआ करती थी। संस्कारों की आड में भीरुता (cowerdnes) और नम्रता के नाम पर शरणागती यह हिंदु कन्याओं की रीत नहीं थी। जिनके व्यक्तित्व में वैसे गुण थे उन कन्याओं ने अपने मनभावन को पति के रूप में प्राप्त किया ही है।
ऐसे अन्य भी अनेक उदाहरण हैं जैसे पार्वती व सती के शिव के साथ विवाह, सत्यवान - सावित्री का विवाह, उलुपी, चित्रांगदा व सुभद्रा के साथ अर्जुन के विवाह आदि !
यह थी भगवान श्रीकृष्ण के निमित्त से हिंदु संस्कृति में स्त्रियों की स्थिति पर चर्चा ! वैसे यह विषय इसके पूर्व कुछ भागों में भी आया हैं।
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श्रीकृष्ण के विवाहों के संदर्भ में सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री. नरेंद्र कोहली इनके वचन उद्धृत करने का मोह संवरण करना संभव नहीं है। क्योंकि वह न केवल कृष्ण का मानवजीवन में उपलब्ध भोगों के प्रति दृष्टीकोण प्रकाशित करते हैं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ती को श्रीकृष्ण की शरण में जाने का तत्व भी समझाते हैं।
बात द्रौपदी विवाह की हैं। राजा द्रुपद अपनी तेजस्विनी कन्या का विवाह श्रीकृष्ण से करना चाहते थे।
कृष्ण के सुझाव के अनुसार स्वयंवर का पण (शर्त / प्रतिज्ञा) भी रखी गई थी।
श्रीकृष्ण स्वयं भी श्रेष्ठ धनुर्धर थे और यह पण जीतना उनके लिए सहज था।
परंतु वे स्वयंवर में भाग लेने के इच्छुक नहीं थे।
राजा द्रुपद अस्वस्थ थे, उन्होने द्रौपदी से इस संबध में प्रश्न किया।
द्रौपदी के सखा थे कृष्ण !
वह उनके व्यक्तित्व से भलीभाँति परिचित थी।
द्रौपदी ने पिता से कहा, "तात्, कृष्ण को पाने के लिए उनके सम्मुख समर्पण करना होता है, स्वयंवर की शर्तें नहीं रखी जाती!"
कितना मनोज्ञ भाव हैं !
कोई भी व्यक्ती केवल समर्पण भावना से ही कृष्ण को पा सकता हैं, अन्य कुछ भी आवश्यक नहीं हैं !
कृष्ण के व्यक्तित्व का सुंदर पहलु है यह !
द्रौपदी जैसी कमनीय, अनुपम सुंदरी विदुषी के लिए भी श्रीकृष्ण के मन में कोई मोह नहीं हैं, सहजसाध्य होते हुए भी वह इस विवाह के लिए उत्सुक नहीं हैं। द्रौपदी से सखित्व के नाते में ही संतुष्ट रहना उनके शारीर भोगों के प्रति उदासीनता का परिचायक हैं !
जय श्रीकृष्ण🙏🏼
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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